लक्ष्मी जी की आरती इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
हिंदू धर्म में पूजा का समापन आरती के बिना अधूरा माना जाता है — और जब बात माता लक्ष्मी की हो तो आरती का महत्व और भी बढ़ जाता है। लेकिन बहुत से लोग आरती तो गाते हैं लेकिन उसका सही अर्थ नहीं जानते, सही विधि नहीं जानते और वो 5 जरूरी नियम नहीं जानते जो आरती को सच में फलदायी बनाते हैं। आज इस लेख में हम आपको लक्ष्मी जी की सम्पूर्ण आरती, उसका अर्थ और सही विधि देंगे।
॥ श्री महालक्ष्मी जी की आरती ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
॥ इति श्री महालक्ष्मी आरती सम्पूर्णम् ॥
आरती का अर्थ — हर पंक्ति का भाव जानें
पहली पंक्ति में कहा गया है कि हे माता लक्ष्मी, स्वयं भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी आपकी रात-दिन सेवा करते हैं — तो हम साधारण मनुष्य तो आपके चरणों में शीश नवाते हैं। दूसरी पंक्ति में माता को उमा यानी पार्वती, रमा यानी लक्ष्मी और ब्रह्माणी यानी सरस्वती तीनों का स्वरूप बताया गया है — अर्थात माता लक्ष्मी में तीनों देवियों की शक्ति समाहित है। तीसरी पंक्ति में कहा गया है कि जो भक्त माता का ध्यान करता है उसे ऋद्धि यानी समृद्धि और सिद्धि यानी सफलता दोनों की प्राप्ति होती है। चौथी पंक्ति में माता को भवसागर यानी संसार के कष्टों से पार कराने वाली त्राता कहा गया है। पांचवीं पंक्ति का भाव है कि जिस घर में माता लक्ष्मी का वास होता है वहां सद्गुण, सुख और शांति अपने आप आ जाती है। छठी पंक्ति में माता की महिमा बताते हुए कहा गया है कि बिना माता की कृपा के न यज्ञ संभव है न वस्त्र-भोजन का वैभव। सातवीं पंक्ति में कहा गया है कि समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्न भी माता लक्ष्मी की कृपा के बिना नहीं मिल सकते थे। अंतिम पंक्ति में फल बताया गया है कि जो व्यक्ति यह आरती श्रद्धा से गाता है उसके मन में आनंद भर जाता है और पाप नष्ट हो जाते हैं।
आरती की सही विधि — इन 5 नियमों का पालन जरूरी है
पहला नियम — आरती हमेशा घी के दीपक से करें। माता लक्ष्मी को घी का प्रकाश अत्यंत प्रिय है और तेल के दीपक से की गई आरती का फल आधा माना जाता है।
दूसरा नियम — आरती के समय थाली में दीपक के साथ कपूर, अगरबत्ती, पुष्प और जल का कलश अवश्य रखें। यह पंचोपचार पूजा का आवश्यक अंग है।
तीसरा नियम — आरती करते समय थाली को घड़ी की दिशा में यानी दाएं से बाएं गोल घुमाएं। आरती की थाली को 7 बार गोल घुमाना शुभ माना जाता है।
चौथा नियम — आरती के समय शंख और घंटी बजाएं। इनकी ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और माता लक्ष्मी का आगमन होता है।
पांचवां नियम — आरती के बाद माता के चरणों में प्रसाद अर्पित करें और परिवार के सभी सदस्यों में बांटें। प्रसाद कभी भी व्यर्थ न करें — यह माता का आशीर्वाद है।
आरती का सही समय — इस वक्त करने पर मिलता है दोगुना फल
लक्ष्मी जी की आरती के लिए सबसे उत्तम समय शाम का संध्याकाल है — सूर्यास्त के बाद और रात होने से पहले का वो समय जब घर में दीपक जलाए जाते हैं। इस समय माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जिस घर में आरती और दीपक का प्रकाश होता है वहां वो प्रवेश करती हैं। शुक्रवार की शाम को की गई आरती विशेष फलदायी मानी जाती है क्योंकि शुक्रवार माता लक्ष्मी का प्रिय दिन है। दीपावली की रात पूरे विधि-विधान से की गई आरती पूरे साल माता की कृपा बनाए रखती है।
॥ जय माता लक्ष्मी
नोट: इस लेख में दी गई आरती और जानकारी धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों पर आधारित है। आरती का पाठ सदैव शुद्ध मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ करें।