गणेश अथर्वशीर्ष

गणेश अथर्वशीर्ष — वो दिव्य उपनिषद जो गणपति को प्रत्यक्ष करता है

एक सवाल जो हर भक्त के मन में होता है —

“भगवान को कैसे जानें? कैसे पहचानें? कहाँ मिलेंगे?”

हमारे वेदों और उपनिषदों ने हजारों साल पहले इसका जवाब दे दिया था।

गणेश अथर्वशीर्ष।

ये कोई साधारण स्तोत्र नहीं है। ये एक उपनिषद है — अथर्ववेद का अंग। इसमें गणपति ने स्वयं अपना परिचय दिया है। खुद कहा है — “त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि” — तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो।

जब भगवान खुद बताएं कि वो कौन हैं — तो उससे बड़ा परिचय क्या होगा?

इस स्तोत्र में गणपति ने खुद कहा है कि वो ही ब्रह्म हैं, वो ही सृष्टि के कर्ता हैं, वो ही पालनकर्ता हैं, वो ही संहारकर्ता हैं। वो तीनों लोकों में व्याप्त हैं। वो ही चेतना हैं, वो ही सत्य हैं।

और अंत में वो कहते हैं — जो इसे पढ़ेगा, जो इसे समझेगा — वो मुझे पा लेगा।

आज इस पोस्ट में पूरा गणेश अथर्वशीर्ष दे रहे हैं — संस्कृत, हिंदी अर्थ और हर श्लोक की गहराई के साथ।गणेश अथर्वशीर्ष

गणेश अथर्वशीर्ष क्या है — जानो इसकी जड़

गणेश अथर्वशीर्ष अथर्ववेद का एक परिशिष्ट उपनिषद है। इसके ऋषि गणक हैं। छंद निचृद्गायत्री है। देवता गणपति हैं।

इस स्तोत्र में कुल 16 खंड हैं। पहले भाग में मंगलाचरण और शांतिपाठ है। फिर गणपति का स्वयं परिचय है। फिर उनके बीजमंत्र का वर्णन है। और अंत में फलश्रुति है।

ये स्तोत्र गणेश चतुर्थी पर विशेष रूप से पढ़ा जाता है। लेकिन हर बुधवार, हर शुभ कार्य से पहले और हर सुबह इसका पाठ कल्याणकारी है।गणेश अथर्वशीर्ष

॥ श्री गणेश अथर्वशीर्षम् ॥

॥ शांतिपाठ ॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

हे देवो! हम कानों से शुभ सुनें। आँखों से शुभ देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर से देवताओं के हित में आयु बिताएं। इंद्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति हमें स्वस्ति दें। ॐ शांति शांति शांति।

॥ गणपति नमस्कार ॥

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्तासि।
त्वमेव केवलं धर्तासि।
त्वमेव केवलं हर्तासि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥

हे गणपति! तुम्हें नमस्कार। तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम ही केवल कर्ता हो। तुम ही केवल धारण करने वाले हो। तुम ही केवल हरण करने वाले हो। तुम ही यह सब ब्रह्म हो। तुम ही साक्षात् नित्य आत्मा हो।

यह पहला खंड ही इस स्तोत्र का सार है। गणपति यहाँ परब्रह्म के रूप में स्थापित हैं। वो सिर्फ बाधाएं हटाने वाले देव नहीं — वो स्वयं ब्रह्म हैं, आत्मा हैं, सर्वस्व हैं।

॥ शरण प्रार्थना ॥

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥
अव त्वं माम्। अव वक्तारम्।
अव श्रोतारम्। अव दातारम्।
अव धातारम्।
अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥

मैं ऋत (सत्य-नियम) बोलता हूँ। सत्य बोलता हूँ। हे गणपति! मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो, श्रोता की, दाता की, धारण करने वाले की, गुरु की, शिष्य की। पीछे से, आगे से, उत्तर से, दक्षिण से, ऊपर से, नीचे से — सब तरफ से मेरी रक्षा करो।

॥ गणपति स्वरूप — स्वयं परिचय ॥

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥

तुम वाक्मय हो — समस्त वाणी तुम हो। तुम चिन्मय हो — शुद्ध चेतना तुम हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय और विज्ञानमय हो।

यहाँ गणपति की दार्शनिक महिमा है। वाङ्मय — यानी शब्द-ब्रह्म। चिन्मय — शुद्ध चेतना। आनंदमय — परमानंद। ब्रह्ममय — परब्रह्म। ये चारों उपनिषदों के सर्वोच्च तत्व हैं — और ये सब गणपति हैं।

॥ सृष्टि का उद्गम ॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥

यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुममें स्थित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लय को प्राप्त होगा। यह सारा जगत् तुमसे ही प्रतिबिंबित होता है। तुम पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। तुम वाणी के चारों पद हो।

ये सृष्टि का सबसे सरल और गहरा वर्णन है। जन्म, स्थिति और लय — तीनों गणपति से। पंचभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — सब गणपति हैं।

॥ गुणातीत स्वरूप ॥

त्वं गुणत्रयातीतः।
त्वमवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः।
त्वं कालत्रयातीतः।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मकः।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवःस्वरोम्॥

तुम तीनों गुणों से परे हो। तुम तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम तीनों देहों से परे हो। तुम तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार में नित्य स्थित हो। तुम तीनों शक्तियों के स्वरूप हो। योगी तुम्हारा नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, विष्णु हो, रुद्र हो, इंद्र हो, अग्नि हो, वायु हो, सूर्य हो, चंद्रमा हो। तुम ही भूः भुवः स्वः — ॐ हो।

यह खंड सबसे विराट है। यहाँ गणपति सभी देवों के परे — ब्रह्म, विष्णु, महेश, इंद्र सब उनमें समाए हैं। वो मूलाधार में स्थित हैं — शरीर की मूल शक्ति के केंद्र में।गणेश अथर्वशीर्ष

॥ गणपति बीजमंत्र ॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्।
अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्।
तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्।
गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्।
नादः सन्धानम्। सँहिता सन्धिः।
सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः।
निचृद्गायत्री छन्दः। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नमः॥

पहले गण (ग) फिर वर्णादि (अ) बोलो, फिर अनुस्वार (ं) — अर्धचंद्र से सुशोभित, ॐ से युक्त — यही तुम्हारे मंत्र का स्वरूप है। ग — पूर्व रूप, अ — मध्य रूप, अनुस्वार — अंत्य रूप, बिंदु — उत्तर रूप। नाद संधान है। यही गणेश विद्या है। गणक ऋषि, निचृद्गायत्री छंद, गणपति देवता। ॐ गं गणपतये नमः।

यह खंड ॐ गं बीजमंत्र की व्याख्या है। + + अनुस्वार = गं। यह सबसे शक्तिशाली गणेश बीजमंत्र है।

॥ गणेश गायत्री और ध्यान ॥

एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

एकदंत को हम जानते हैं। वक्रतुंड का हम ध्यान करते हैं। वो दंती हमें प्रेरित करें।

यह गणेश गायत्री है। एकदन्त — एक दाँत वाले। वक्रतुण्ड — घुमावदार सूंड वाले। दन्ती — दाँत वाले। यह त्रिपदी गायत्री तीनों लोकों का सार है।

॥ एकदंत ध्यान ॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्।
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥

एक दाँत वाले, चार हाथों में पाश, अंकुश, दाँत और वरद मुद्रा धारण करने वाले, मूषक ध्वज वाले। लाल रंग, लंबोदर, सूप जैसे कान, लाल वस्त्र, लाल चंदन से लिपे, लाल फूलों से पूजित। भक्तों पर अनुकंपा करने वाले देव, जगत् के कारण, अच्युत। सृष्टि के आदि में प्रकृति और पुरुष से परे प्रकट हुए। जो नित्य ऐसा ध्यान करता है — वो योगियों में श्रेष्ठ योगी है।

॥ वंदना ॥

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नमः प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय
विघ्ननाशिने शिवसुताय
श्रीवरदमूर्तये नमः॥

व्रातपति को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रमथपति को नमस्कार। लंबोदर, एकदंत, विघ्ननाशक, शिव के पुत्र, श्री वरदमूर्ति को नमस्कार।गणेश अथर्वशीर्ष

॥ फलश्रुति ॥

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते।
स सर्वतः सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते॥

जो इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है — वो ब्रह्म को प्राप्त होने योग्य बनता है। उसे कोई विघ्न नहीं बाधता। वो सब तरफ से सुख पाता है। वो पाँच महापापों से मुक्त होता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति॥

सायंकाल पढ़ने से दिन के पाप नष्ट होते हैं। प्रातः पढ़ने से रात के पाप नष्ट होते हैं। सायं-प्रातः दोनों पढ़ने से पाप-मुक्त होता है। सर्वत्र पढ़ने से विघ्न-मुक्त होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते
तं तमनेन साधयेत्॥

यह अथर्वशीर्ष अशिष्य को नहीं देना चाहिए। जो मोहवश दे — वो पापी होता है। एक हजार आवर्तन से जो-जो कामना हो — वो-वो इससे सिद्ध होती है।

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वणवाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचनेति॥

इससे गणपति का अभिषेक करने वाला वाग्मी (वाकपटु) बनता है। चतुर्थी को उपवास रखकर जप करने वाला विद्यावान बनता है। यह अथर्ववेद का वाक्य है। ब्रह्म का आवरण जानने वाला कभी नहीं डरता।

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छितफलमवाप्नोति।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥

जो दूर्वा-अंकुरों से यजन करता है — वो कुबेर के समान होता है। जो लाजा से यजन करता है — वो यशस्वी और मेधावी बनता है। जो हजार मोदकों से यजन करता है — वो मनचाहा फल पाता है। जो घी और समिधा से यजन करता है — वो सब कुछ पाता है, सब कुछ पाता है।गणेश अथर्वशीर्ष

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा
सिद्धमन्त्रो भवति।
महाविघ्नात् प्रमुच्यते।
महादोषात् प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति। स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥

आठ ब्राह्मणों को सम्यक् सुनाने वाला सूर्य जैसा तेजस्वी होता है। सूर्यग्रहण में, महानदी में या प्रतिमा के सामने जप करने वाला सिद्धमंत्र बनता है। महाविघ्न से मुक्त होता है। महादोष से मुक्त होता है। महापाप से मुक्त होता है। वो सर्वज्ञ बनता है। जो यह जानता है — यह उपनिषद है।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

गणेश अथर्वशीर्ष की तीन सबसे बड़ी बातें

पहली बात — यह एकमात्र ऐसा स्तोत्र है जिसमें भगवान गणपति ने स्वयं अपना परिचय दिया है। वो कहते हैं — मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही आत्मा हूँ, मैं ही सृष्टि का कारण हूँ। जब भगवान खुद बताएं — तो उससे बड़ा प्रमाण क्या?

दूसरी बात — इसमें ॐ गं बीजमंत्र की व्याख्या है। यह सबसे छोटा और सबसे शक्तिशाली गणेश मंत्र है। सिर्फ दो अक्षर — और इनमें पूरी ब्रह्म-शक्ति है।

तीसरी बात — फलश्रुति में कहा गया है — जो इसे एक हजार बार पढ़े — उसकी हर कामना पूरी होती है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों पुरुषार्थ मिलते हैं।

गणेश अथर्वशीर्ष कब और कैसे पढ़ें

बुधवार और चतुर्थी को विशेष रूप से पढ़ो। गणेश चतुर्थी पर 21 बार पाठ करने का विशेष महत्व है। सुबह स्नान के बाद लाल आसन पर बैठो। सामने गणपति की मूर्ति या चित्र रखो। लाल फूल, दूर्वा और मोदक अर्पित करो। घी का दीपक जलाओ।

पाठ के बाद ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करो।

अंत में

गणेश अथर्वशीर्ष में एक वाक्य है जो सब कुछ कह देता है —

“त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।”

तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो।

मतलब — भगवान कहीं दूर नहीं हैं। वो प्रत्यक्ष हैं। सामने हैं। यहाँ हैं। अभी हैं।

बस देखने वाली आँख चाहिए।

जब रोज सुबह गणेश अथर्वशीर्ष पढ़ते हो — तो वो आँख खुलती है। और तब हर जगह गणपति दिखते हैं।

जय गणपति। ॐ गं गणपतये नमः


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