लिंगाष्टकम् — भगवान शिव के शिवलिंग की वो आठ स्तुतियाँ जो हर मनोकामना पूरी करती हैं
एक सवाल जो हर शिव भक्त के मन में होता है —
“शिवलिंग क्यों? भगवान शिव की मूर्ति क्यों नहीं?”
इसका जवाब बहुत गहरा है।
शिवलिंग — लिंग यानी प्रतीक। वो अनंत, निराकार, अद्वितीय परम सत्ता का प्रतीक जिसका न आदि है न अंत।
एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ — कौन बड़ा है। तभी एक अनंत ज्योति-स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा ऊपर गए — अंत नहीं मिला। विष्णु नीचे गए — अंत नहीं मिला। वो ज्योति-स्तंभ ही शिवलिंग है।
लिंगाष्टकम् — आठ श्लोक। हर श्लोक में शिवलिंग की एक विशेष महिमा। हर श्लोक के अंत में एक पवित्र टेक —
“लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।”
आदि शंकराचार्य की रचना। काशी में लिखी गई।
लिंगाष्टकम् क्या है — जानो इसकी महिमा
लिंगाष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसमें आठ श्लोक हैं। हर श्लोक में शिवलिंग के अभिषेक, पूजा, और महिमा का वर्णन है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें शिवलिंग पर विभिन्न सामग्रियों से अभिषेक का वर्णन है — जल, दूध, दही, घी, मधु, गंगाजल। हर अभिषेक का एक विशेष फल है।
जो इस स्तोत्र को पढ़ता है — उसे शिवलिंग पूजा का पूर्ण फल मिलता है।
॥ लिंगाष्टकम् ॥
॥ आदि शंकराचार्य विरचितम् ॥
॥ पूर्वभाग ॥
ॐ नमः शिवाय।
॥ आठ श्लोक ॥
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं।
निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।१।।
ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित शिवलिंग। निर्मल प्रकाश से शोभित शिवलिंग। जन्म के दुःखों का नाश करने वाला शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
पहले श्लोक में ही शिवलिंग की सर्वोच्च महिमा स्थापित है। ब्रह्ममुरारिसुरार्चित — ब्रह्मा, विष्णु और समस्त देवता जिसकी पूजा करते हैं। जब देवता खुद पूजा करते हों — तो हम साधारण मनुष्यों की बात ही क्या। जन्मजदुःखविनाशक — जन्म की पीड़ा नष्ट करने वाला — यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति।
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं।
कामदहनकरुणाकरलिङ्गम्।।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।२।।
देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा पूजित शिवलिंग। कामदेव को भस्म करने वाला, करुणा का सागर शिवलिंग। रावण के दर्प का नाश करने वाला शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
कामदहनकरुणाकर — कामदेव को भस्म किया — यानी काम पर विजय। लेकिन साथ ही करुणाकर — करुणा का सागर भी। शिव कठोर भी हैं, कोमल भी। रावणदर्पविनाशन — रावण ने कैलाश उठाया — शिव ने पैर के अंगूठे से दबाकर उसका अहंकार चूर किया।
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं।
बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।३।।
सभी सुगंधों से सुलेपित शिवलिंग। बुद्धि को विकसित करने का कारण शिवलिंग। सिद्धों, देवताओं और असुरों द्वारा वंदित शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
सर्वसुगंधिसुलेपित — सभी सुगंधियों से लेपित। जब शिवलिंग पर चंदन, केसर, कस्तूरी अर्पण करते हैं — तो सुगंध फैलती है। यह सुगंध मन को शांत करती है। बुद्धिविवर्धनकारण — बुद्धि बढ़ाने का कारण। शिव बुद्धि के देव हैं।
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं।
फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्।।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।४।।
सोने और महामणियों से भूषित शिवलिंग। सर्पराज से वेष्टित और शोभित शिवलिंग। दक्ष के कुयज्ञ का नाश करने वाला शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
कनकमहामणिभूषित — सोने और रत्नों से सजाया शिवलिंग — जैसे सोमनाथ, काशी विश्वनाथ। फणिपतिवेष्टित — सर्पराज से लिपटा। दक्षसुयज्ञविनाशन — दक्ष ने अहंकार से यज्ञ किया, शिव को नहीं बुलाया — शिव ने उसे नष्ट कर दिया। अहंकार कभी नहीं चलता।
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं।
पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।५।।
कुमकुम और चंदन से लेपित शिवलिंग। कमल की माला से सुशोभित शिवलिंग। संचित पापों का नाश करने वाला शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
कुंकुमचंदनलेपित — कुमकुम और चंदन — लाल और सफेद। लाल शक्ति का प्रतीक, सफेद शांति का। दोनों एक साथ — शिव और शक्ति। संचितपापविनाशन — जन्मों के संचित पाप नष्ट होते हैं शिवलिंग दर्शन से।
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं।
भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।६।।
देवगणों द्वारा अर्चित और सेवित शिवलिंग। भाव और भक्ति से ही पूजित शिवलिंग। करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
भावैर्भक्तिभिरेव च — केवल भाव और भक्ति से पूजित। यही सबसे बड़ी बात है। शिव को धन नहीं चाहिए, ऐश्वर्य नहीं चाहिए। बस भाव चाहिए। जो भाव से पूजता है — शिव उसके हो जाते हैं। दिनकरकोटिप्रभाकर — करोड़ों सूर्यों का प्रकाश भी शिव की ज्योति के सामने फीका है।
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं।
सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।७।।
आठ दलों (पंखुड़ियों) से वेष्टित शिवलिंग। सभी की उत्पत्ति का कारण शिवलिंग। आठ प्रकार की दरिद्रता नष्ट करने वाला शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
अष्टदलोपरिवेष्टित — आठ पंखुड़ियों वाले कमल पर स्थित। यह अष्टदल कमल आठ दिशाओं का प्रतीक है। अष्टदरिद्रविनाशित — आठ प्रकार की दरिद्रता — धन दरिद्रता, विद्या दरिद्रता, स्वास्थ्य दरिद्रता, यश दरिद्रता, संतान दरिद्रता, बल दरिद्रता, आयु दरिद्रता और मोक्ष दरिद्रता — सब नष्ट होती हैं।लिंगाष्टकम्
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं।
सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्।।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं।
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।८।।
देवताओं के गुरु बृहस्पति और श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित शिवलिंग। देवताओं के वन के पुष्पों से सदा अर्चित शिवलिंग। परात्पर, परमात्मा स्वरूप शिवलिंग। उन सदाशिव के लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।लिंगाष्टकम्
परात्परं परमात्मकलिङ्गम् — यह आठवाँ और सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है। शिवलिंग केवल पत्थर नहीं — यह परात्पर है, सर्वोच्च से भी ऊँचा। यह परमात्मा का स्वरूप है। जो इसे जानकर पूजता है — वो साक्षात् परमात्मा की पूजा करता है।
॥ फलश्रुति ॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।
जो पुण्य लिंगाष्टकम् को शिव के सामने पढ़े — वो शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंद लेता है।लिंगाष्टकम्
ॐ नमः शिवाय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
लिंगाष्टकम् की आठ विशेष बातें
हर श्लोक में शिवलिंग की एक विशेष विशेषता है जो हमें जीवन का एक संदेश देती है।
पहला श्लोक — ब्रह्मा-विष्णु भी पूजते हैं। यानी अहंकार छोड़ो — बड़े से बड़ा भी शिव के सामने नत है।
दूसरा श्लोक — काम को जलाया, करुणा रखी। यानी कामनाओं पर विजय — लेकिन करुणा कभी नहीं छोड़ी।
तीसरा श्लोक — बुद्धि बढ़ाता है। यानी शिव ज्ञान और विवेक के देव हैं।
चौथा श्लोक — रावण का अहंकार तोड़ा। यानी अहंकार का अंत निश्चित है।
पाँचवाँ श्लोक — संचित पाप नष्ट होते हैं। यानी जन्मों के पाप भी शिव की कृपा से मिट जाते हैं।
छठा श्लोक — भाव और भक्ति से पूजित। यानी बड़ी पूजा नहीं चाहिए — बस सच्चा भाव चाहिए।
सातवाँ श्लोक — आठ दरिद्रताएं नष्ट होती हैं। यानी हर प्रकार की कमी दूर होती है।
आठवाँ श्लोक — परमात्मा स्वरूप। यानी शिवलिंग की पूजा परमात्मा की पूजा है।
लिंगाष्टकम् कब और कैसे पढ़ें
सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि को विशेष रूप से पढ़ो। सुबह स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र अर्पण करके पढ़ो। घी का दीपक जलाओ।लिंगाष्टकम्
पाठ के बाद ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करो।
अंत में
लिंगाष्टकम् में एक पंक्ति सब कुछ कह देती है —
“भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।”
शिवलिंग केवल भाव और भक्ति से पूजित होता है।
न सोना चाहिए, न चाँदी। न बड़ा मंदिर, न बड़ी पूजा। बस एक लोटा जल। बस एक बेलपत्र। बस एक सच्चा दिल।
और शिव प्रसन्न।
यही शिव की सबसे बड़ी विशेषता है — वो भोलेनाथ हैं। सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले। सबसे जल्दी माफ करने वाले।
ॐ नमः शिवाय
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