शिव पंचाक्षर स्तोत्र: सिर्फ 5 अक्षरों में छुपा है मोक्ष का राज — जानिए हर श्लोक का असली
शिव पंचाक्षर स्तोत्र — नाम सुना होगा, मंदिर में गाते भी देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस स्तोत्र में आखिर ऐसा क्या है जो हजारों साल बाद भी लोग इसे रोज पढ़ते हैं? क्यों कहा जाता है कि “नमः शिवाय” के पांच अक्षर इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं? अगर आप सच में जानना चाहते हैं तो यह लेख पूरा पढ़िए — क्योंकि यहां हम सिर्फ श्लोक नहीं बताएंगे, बल्कि उनके पीछे की वो गहरी सच्चाई भी बताएंगे जो शायद आपने कभी नहीं
पहले समझिए — पंचाक्षर स्तोत्र है क्या
“पंचाक्षर” यानी पांच अक्षर — न, मः, शि, वा, य — यही है “नमः शिवाय” का महामंत्र। आदि शंकराचार्य ने इसी महामंत्र पर आधारित एक अद्भुत स्तोत्र की रचना की जिसे शिव पंचाक्षर स्तोत्र कहते हैं। इस स्तोत्र में 6 श्लोक हैं और हर श्लोक उस महामंत्र के एक-एक अक्षर से शुरू होता है। यही इस स्तोत्र की सबसे बड़ी खासियत है।
शंकराचार्य जैसे महान दार्शनिक ने जब इसे लिखा, तो सोचिए — इसमें कितनी गहराई होगी। यह सिर्फ भजन नहीं, यह एक पूरी ब्रह्मांड-व्याख्या है जो शब्दों की माला में पिरोई गई है।
पहला श्लोक — “न” से नागेंद्रहाराय
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥
यह श्लोक शिव के उस रूप को दर्शाता है जो हर चीज से परे हैं। “नागेंद्रहार” यानी जिनके गले में नागों का हार है — यह भय का प्रतीक नहीं, शक्ति का प्रतीक है। “त्रिलोचन” यानी तीन आंखों वाले — जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों देखते हैं। “दिगंबर” यानी जिन्होंने दिशाओं को ही वस्त्र बना लिया — यानी जिन्हें किसी चीज की जरूरत ही नहीं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि जो सच में शक्तिशाली है, उसे दिखावे की जरूरत नहीं होती।
दूसरा श्लोक — “मः” से मंदाकिनी
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै मकाराय नमः शिवाय
गंगा जिन्हें “मंदाकिनी” भी कहते हैं — वो शिव की जटाओं में निवास करती हैं। यह श्लोक शिव की उस करुणा को दर्शाता है जो पूरी सृष्टि को धारण करती है। नंदी उनका परम भक्त है, मंदार के फूलों से उनकी पूजा होती है।
यह श्लोक याद दिलाता है — जो सच में महान होता है, वो दूसरों को भी ऊपर उठाता है।
तीसरा श्लोक — “शि” से शिवाय
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥
यहां शिव को “गौरी के मुखकमल के सूर्य” कहा गया है — जैसे सूरज कमल खिलाता है, वैसे शिव पार्वती के जीवन को प्रकाशित करते हैं। “नीलकंठ” — जिन्होंने समुद्र मंथन का विष खुद पी लिया ताकि दुनिया बच सके। यही तो असली त्याग है।
यह श्लोक हमें सिखाता है — दूसरों की खुशी के लिए खुद तकलीफ उठाना ही सच्चा प्रेम है।
चौथा श्लोक — “वा” से वशिष्ठ
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै वकाराय नमः शिवाय॥
वशिष्ठ, अगस्त्य, गौतम — ये महान ऋषि भी शिव की आराधना करते थे। इसीलिए शिव को “मुनींद्र देव अर्चित” कहा गया। उनके तीन नेत्र चंद्र, सूर्य और अग्नि हैं — यानी वो खुद पूरा ब्रह्मांड हैं।
यह श्लोक बताता है — जब बड़े-बड़े ज्ञानी भी किसी के आगे नतमस्तक हों, तो समझो वो सच में असाधारण है।
पांचवां श्लोक — “य” से यज्ञ
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै यकाराय नमः शिवाय॥
शिव खुद यज्ञ के स्वरूप हैं — वो आहुति लेने वाले नहीं, खुद आहुति हैं। पिनाक धनुष धारण करने वाले — शक्ति जिनके हाथ में है, लेकिन वो उसका उपयोग विनाश के लिए नहीं, सृजन के लिए करते हैं। “सनातन” — जो अनादि काल से थे, हैं और रहेंगे।
छठा श्लोक — फलश्रुति
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
यह अंतिम श्लोक फलश्रुति है — यानी इस स्तोत्र को पढ़ने का फल क्या मिलता है। जो भी व्यक्ति शिव की उपस्थिति में इन पांच पवित्र अक्षरों का पाठ करता है, वो शिवलोक को प्राप्त करता है और स्वयं शिव के साथ आनंद में रहता है।
यह स्तोत्र सिर्फ धर्म नहीं, विज्ञान भी है
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मंत्रों की ध्वनि-तरंगें मस्तिष्क पर गहरा असर डालती हैं। “नमः शिवाय” का उच्चारण करते समय जो कंपन पैदा होती है, वो मन को शांत करती है, एकाग्रता बढ़ाती है और नकारात्मकता को दूर करती है। यही कारण है कि इस स्तोत्र को हजारों सालों से लोग रोज पढ़ते आए हैं और आज भी पढ़ते हैं।
कब और कैसे करें पाठ
सुबह स्नान के बाद, शिवलिंग के सामने या घर में दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करना सबसे उत्तम माना गया है। सोमवार को इसका विशेष महत्व है। अगर रोज नहीं हो सकता, तो श्रावण मास में तो जरूर करें — इसका फल कई गुना बढ़ जाता है।
अंत में
शिव पंचाक्षर स्तोत्र सिर्फ एक धार्मिक रचना नहीं है — यह जीवन जीने का एक तरीका है। हर श्लोक एक संदेश देता है — त्याग का, करुणा का, शक्ति का और विनम्रता का। अगर इस स्तोत्र को सच में समझकर पढ़ा जाए, तो शायद मंदिर जाने की जरूरत भी न पड़े — शिव खुद आपके अंदर मिल जाएंगे।
हर हर महादेव
