श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र

श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र — जानिए इस पवित्र स्तोत्र का अर्थ, महत्व और पाठ की विधि, एक बार पढ़ने से बदल जाएगी किस्मत!

अगर आप जीवन में आ रही हर बाधा से थक चुके हैं, हर काम में रुकावट आ रही है और मन में बेचैनी बनी रहती है — तो आज हम आपके लिए लेकर आए हैं एक ऐसा दिव्य स्तोत्र जो सदियों से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करता आया है। जी हां, हम बात कर रहे हैं श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र की।


श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र क्या है और क्यों है यह इतना खास

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है। चाहे कोई भी शुभ काम हो, विवाह हो, गृह प्रवेश हो, नई नौकरी हो या कोई यात्रा — सबसे पहले गणेश जी का आशीर्वाद लिया जाता है। इसीलिए उन्हें विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य कहा जाता है।

श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य जी ने की थी। यह स्तोत्र पांच श्लोकों से मिलकर बना है और इसीलिए इसे पंच रत्न यानी पांच रत्नों का खजाना कहा जाता है। हर श्लोक अपने आप में एक रत्न की तरह है जो भगवान गणेश की महिमा का वर्णन करता है।

जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है उसके जीवन से सभी विघ्न और बाधाएं दूर हो जाती हैं। मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है।


श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र — संपूर्ण पाठ

॥ श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्रम् ॥

श्लोक १:
मुदाकरात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकं।
कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम्।
अनायकैक नायकं विनाशितेभदैत्यकं।
नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम्॥

श्लोक २:
नतेतरातिभीकरं नवोदितार्क भास्वरं।
नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्धरम्।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं।
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥

श्लोक ३:
समस्त लोक शंकरं निरस्त दैत्य कुञ्जरं।
दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्र मक्षरम्।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं।
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥

श्लोक ४:
अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनं।
पुरारिपूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम्।
प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणं।
कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम्॥

श्लोक ५:
नितान्त कान्त दन्त कान्तिमन्त कान्त कात्मजं।
अचिन्त्य रूप मन्त हीन मन्तराय कृन्तनम्।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां।
तमेकदन्त मेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥

॥ फलश्रुति ॥
महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं।
प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम्।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां।
समाहितायु रष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्॥


हर श्लोक का सरल हिंदी अर्थ

पहले श्लोक का अर्थ:
जो अपने हाथों में मोदक लेकर सदा भक्तों को मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं, जो चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं, जो सामान्य जनों की रक्षा करते हैं, जो बिना किसी नायक के स्वयं ही सबके नायक हैं, जिन्होंने गजासुर दैत्य का नाश किया और जो अपने भक्तों के सभी अशुभ नष्ट कर देते हैं — ऐसे विनायक को मैं नमन करता हूं।

दूसरे श्लोक का अर्थ:
जो दूसरों के लिए बेहद भयंकर हैं लेकिन भक्तों के लिए करुणामय हैं, जो उगते हुए सूर्य की तरह तेजस्वी हैं, जिनके सामने देवता और दैत्य दोनों नतमस्तक होते हैं, जो संकट में पड़े भक्तों का उद्धार करते हैं — ऐसे देवों के ईश्वर, गजों के ईश्वर, गणों के ईश्वर, महेश्वर के पुत्र का मैं सदा आश्रय लेता हूं।

तीसरे श्लोक का अर्थ:
जो समस्त संसार में शांति का संचार करते हैं, जिन्होंने दैत्यों का दमन किया, जिनका उदर विशाल और रूप अनुपम है, जो कृपालु, क्षमाशील और यश देने वाले हैं — ऐसे देदीप्यमान गणेश को मैं नमन करता हूं।

चौथे श्लोक का अर्थ:
जो निर्धन और दुखी लोगों के कष्ट दूर करते हैं, जो शिव के पुत्र हैं, जो देवताओं के शत्रुओं का गर्व चूर करते हैं, जो संसार के विनाश से भी भयंकर शक्तिशाली हैं — ऐसे पुरातन हाथी के मुख वाले गणेश का मैं भजन करता हूं।

पांचवें श्लोक का अर्थ:
जिनके दांत की कांति अत्यंत सुंदर है, जो शिव के पुत्र हैं, जिनका रूप अचिंतनीय और अनंत है, जो सभी बाधाओं को काट देते हैं, जो योगियों के हृदय में निरंतर निवास करते हैं — ऐसे एकदंत गणेश का मैं सतत ध्यान करता हूं।

फलश्रुति का अर्थ:
जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रभात काल में इस महागणेश पंच रत्न स्तोत्र का पाठ श्रद्धा से करता है और मन में गणेश जी का स्मरण करता है — वह शीघ्र ही निरोगी काया, निर्दोष जीवन, सत्संग, अच्छी संतान और दीर्घायु को प्राप्त होता है।


पाठ करने की सही विधि

इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

पहली बात यह है कि प्रातःकाल स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पाठ करना सबसे उत्तम माना जाता है। दूसरी बात यह कि पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और सामने गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर रखें। तीसरी बात यह कि दीपक जलाएं, धूप लगाएं और लाल या पीले फूल अर्पित करें क्योंकि ये गणेश जी को विशेष प्रिय हैं। चौथी बात यह कि मोदक या लड्डू का भोग जरूर लगाएं। पांचवीं और सबसे जरूरी बात यह कि पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें और गणेश जी के स्वरूप का ध्यान करते रहें।


कब और कितनी बार करें पाठ

यह स्तोत्र किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है लेकिन बुधवार और चतुर्थी तिथि को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

सामान्य दिनों में एक बार पाठ पर्याप्त होता है लेकिन अगर कोई विशेष मनोकामना हो तो इसे तीन बार या ग्यारह बार भी पढ़ा जा सकता है। जो लोग 21 दिनों तक लगातार इस स्तोत्र का नियमित पाठ करते हैं उन्हें विशेष लाभ मिलता है।


किन लोगों को जरूर करना चाहिए यह पाठ

यह स्तोत्र हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन में किसी न किसी परेशानी से गुजर रहा है। जिन लोगों का कोई काम बार-बार रुक जाता है, जिन विद्यार्थियों की पढ़ाई में मन नहीं लगता, जो व्यापारी व्यापार में घाटा उठा रहे हैं, जो नौकरी की तलाश में हैं, जिनके घर में कलह बनी रहती है या जो किसी बीमारी से परेशान हैं — इन सभी के लिए यह स्तोत्र बेहद लाभकारी है।


आदि शंकराचार्य और इस स्तोत्र की पृष्ठभूमि

आदि शंकराचार्य भारत के महानतम दार्शनिकों में से एक थे। उन्होंने अद्वैत वेदांत की स्थापना की और देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की। उन्होंने अनेक स्तोत्रों की रचना की जिनमें से गणेश पंच रत्न स्तोत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है। इस स्तोत्र में उन्होंने गणेश जी के विभिन्न रूपों और गुणों का इतनी सुंदरता से वर्णन किया है कि इसे पढ़ते समय मन स्वतः ही भक्तिभाव से भर जाता है।


नियमित पाठ के फायदे

जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है उसके जीवन में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। मन में शांति आती है, विचार स्पष्ट होते हैं, निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है और आत्मविश्वास मजबूत होता है। घर में सुख-शांति का माहौल बनता है और रिश्तों में मधुरता आती है। बच्चों की पढ़ाई में सुधार आता है और परिवार स्वस्थ रहता है।


डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक जानकारी और श्रद्धा के आधार पर लिखा गया है। स्तोत्र पाठ के फायदे व्यक्तिगत आस्था और विश्वास पर निर्भर करते हैं। किसी भी शारीरिक या मानसिक समस्या के लिए उचित विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।


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