कालभैरव अष्टकम् — काशी के कोतवाल की वो स्तुति जो काल से भी रक्षा करती है
जिंदगी में एक ऐसा डर होता है जो सबसे बड़ा है —
मृत्यु का डर।
और उससे भी बड़ा डर — काल का डर। समय का डर। कि पता नहीं कब क्या हो जाए।
हमारे शास्त्रों में एक ऐसे देव हैं जो काल के भी स्वामी हैं — कालभैरव।
भगवान शिव का ही एक भयंकर रूप। काशी के कोतवाल। जो काशी में प्राण त्यागने वाले हर आत्मा को तारक मंत्र देकर मोक्ष दिलाते हैं।
कालभैरव अष्टकम् — आदि शंकराचार्य द्वारा रचित। आठ श्लोक। हर श्लोक में कालभैरव का एक अद्भुत, भयंकर और करुणामय रूप।
यह स्तोत्र केवल भय नाश नहीं करता — यह काल पर विजय दिलाता है।कालभैरव अष्टकम्
कालभैरव अष्टकम् क्या है — जानो इसकी कथा
एक बार ब्रह्मा ने अहंकार में आकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताया। शिव का अपमान किया। उसी क्षण शिव से कालभैरव प्रकट हुए — भयंकर, उग्र, प्रचंड। उन्होंने ब्रह्मा के पाँचवें सिर को काट दिया।
लेकिन ब्रह्मा-हत्या के पाप से मुक्ति के लिए कालभैरव को काशी तक भटकना पड़ा। काशी पहुँचते ही वो पाप से मुक्त हो गए।
तब से काशी के कोतवाल कालभैरव हैं। जो काशी में मरता है — कालभैरव उसके कान में तारक मंत्र देते हैं — और मोक्ष मिलता है।कालभैरव अष्टकम्
कालभैरव अष्टकम् इन्हीं कालभैरव की स्तुति है। आदि शंकराचार्य ने काशी में इसकी रचना की।कालभैरव अष्टकम्
॥ कालभैरव अष्टकम् ॥
॥ आदि शंकराचार्य विरचितम् ॥
॥ पूर्वभाग ॥
ॐ नमः कालभैरवाय।
॥ आठ श्लोक ॥
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं।
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।१।।
देवराज इंद्र द्वारा सेवित पवित्र चरण-कमल वाले। सर्प यज्ञसूत्र धारी, चंद्र को शिखर पर धारण करने वाले, कृपाकर। नारद आदि योगिवृंद द्वारा वंदित, दिगंबर। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
पहले ही श्लोक में कालभैरव का परम स्वरूप प्रकट होता है। देवराजसेव्यमान — इंद्र जैसे देवताओं के राजा भी जिनके चरण सेवते हैं। व्यालयज्ञसूत्रम् — सर्प ही जनेऊ है। काशिकापुराधिनाथ — काशी के अधिनाथ — यानी काशी के असली शासक कालभैरव हैं।
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं।
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।।
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।२।।
करोड़ सूर्यों जैसे प्रकाशमान, भवसागर से तारने वाले, परम। नीलकंठ, अभीष्ट अर्थ देने वाले, त्रिलोचन। काल के भी काल, कमल-नयन, हाथ में शूल, अक्षर (अविनाशी)। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।कालभैरव अष्टकम्
कालकालम् — काल के भी काल। यानी मृत्यु की भी मृत्यु। जो कालभैरव की शरण लेता है — उसे काल भी नहीं डरा सकता। भवाब्धितारकम् — भव-सागर से पार करने वाले। अक्षरम् — अविनाशी, अक्षय।
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं।
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।३।।
हाथों में शूल, टंक (कुठार), पाश और दंड धारण करने वाले, आदि कारण। श्यामकाय, आदिदेव, अक्षर, निरामय। भीम विक्रमी, प्रभु, विचित्र तांडव प्रिय। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
शूलटंकपाशदंडपाणि — चारों हाथों में चार आयुध। शूल — त्रिशूल यानी तीनों तापों का नाश। टंक — कुठार यानी अज्ञान काटना। पाश — बंधनों को नष्ट करना। दंड — दुष्टों को दंड। विचित्रतांडवप्रियम् — विचित्र तांडव प्रिय — यानी कालभैरव का नृत्य सृष्टि और संहार दोनों है।
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं।
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।४।।
भोग और मोक्ष देने वाले, सुंदर और प्रशस्त विग्रह वाले। भक्तवत्सल, समस्त लोकों के विग्रह में स्थित। मनोज्ञ सोने की किंकिणी (घुंघरू) से शोभित कमर वाले। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
भुक्तिमुक्तिदायकम् — भोग भी देते हैं, मोक्ष भी। यानी कालभैरव भक्त को न सिर्फ इस लोक का सुख देते हैं — परलोक की मुक्ति भी। भक्तवत्सल — भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले। भयंकर रूप में भी भक्तों पर प्रेम है।
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं।
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।५।।
धर्म के सेतु के पालक, अधर्म के मार्ग का नाश करने वाले। कर्म के पाश से मुक्त करने वाले, सुख देने वाले, विभु। सोने के वर्ण के सर्प पाश से शोभित अंगों वाले। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
धर्मसेतुपालकम् — धर्म के रक्षक। कालभैरव काशी के कोतवाल हैं — न्याय करते हैं। जो पापी है — उसे दंड, जो धर्मी है — उसे सुख। कर्मपाशमोचकम् — कर्म के बंधनों से मुक्त करने वाले।
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं।
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम्।।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।६।।
रत्न पादुका की प्रभा से सुंदर युगल पादों वाले। नित्य, अद्वितीय, इष्टदेव, निरंजन। मृत्यु के दर्प का नाश करने वाले, कराल दाँतों से मोक्ष देने वाले। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
मृत्युदर्पनाशनम् — मृत्यु के अहंकार को नष्ट करने वाले। जो मृत्यु को भी दर्प है — उसका दर्प कालभैरव नष्ट करते हैं। करालदंष्ट्रमोक्षणम् — कराल दाँतों वाले लेकिन मोक्ष देने वाले। बाहर से भयंकर — भीतर से मोक्षदाता।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं।
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।७।।
अट्टहास से ब्रह्माण्ड को विभाजित करने वाले। दृष्टिपात से पाप-जाल को नष्ट करने वाले, उग्र शासन वाले। अष्ट सिद्धि देने वाले, कपाल-माली धारण करने वाले। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोश — जिनके अट्टहास से ब्रह्माण्ड कंप जाता है। दृष्टिपातनष्टपापजालम् — जिनकी दृष्टि मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। अष्टसिद्धिदायकम् — आठों सिद्धियाँ — अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व — देने वाले।
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं।
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं।
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे।।८।।
भूत-संघ के नायक, विशाल कीर्ति देने वाले। काशी में रहने वाले लोगों के पुण्य और पाप का शोधन करने वाले, विभु। नीति मार्ग के ज्ञाता, पुरातन, जगत के पति। काशीपुर के अधिनाथ कालभैरव को मैं भजता हूँ।
भूतसंघनायकम् — भूत-प्रेतों के नायक। कालभैरव के भक्त को भूत-बाधा नहीं होती — क्योंकि उनके नायक ही कालभैरव हैं। काशिवासलोकपुण्यपापशोधकम् — काशी के निवासियों के पाप-पुण्य का हिसाब करने वाले। कोतवाल का काम यही है।
॥ फलश्रुति ॥
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं।
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं।
प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम्।।
जो मनोहर कालभैरव अष्टकम् पढ़ते हैं — जो ज्ञान और मुक्ति का साधन है, विचित्र पुण्य बढ़ाने वाला है। शोक, मोह, दीनता, लोभ, क्रोध और ताप का नाश करने वाला है। वो निश्चित रूप से कालभैरव के चरणों की सन्निधि को प्राप्त होते हैं।
ॐ नमः कालभैरवाय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
कालभैरव के आठ रूपों का रहस्य
कालभैरव अष्टकम् में आठ श्लोकों में आठ अलग-अलग शक्तियाँ हैं।
पहला श्लोक — काशी के अधिनाथ — देवता भी जिनकी सेवा करते हैं।
दूसरा श्लोक — काल के भी काल — मृत्यु का भय नहीं।
तीसरा श्लोक — चार आयुधधारी — चारों तरफ से रक्षा।
चौथा श्लोक — भुक्ति और मुक्ति दोनों — इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण।
पाँचवाँ श्लोक — धर्म के रक्षक — कर्म के बंधन से मुक्ति।
tel:%2008407078819छठा श्लोक — मृत्यु के दर्प का नाश — निर्भयता।
सातवाँ श्लोक — अष्टसिद्धि दाता — सभी सिद्धियाँ।
आठवाँ श्लोक — जगत के पति — सम्पूर्ण जगत् का स्वामित्व।
कालभैरव की उपासना क्यों करें
कालभैरव की उपासना के तीन मुख्य लाभ हैं।
पहला — भय नाश। जो भी भय हो — काल का, शत्रु का, रोग का — कालभैरव उसे नष्ट करते हैं।
http://Google.comदूसरा — काशी और मोक्ष। माना जाता है कि कालभैरव की कृपा से जीव को काशी में अंतिम क्षण में तारक मंत्र मिलता है।
तीसरा — धर्म की रक्षा। जो धर्म के मार्ग पर चलता है — कालभैरव उसके रक्षक हैं।
कालभैरव अष्टकम् कब और कैसे पढ़ें
रविवार और अष्टमी को विशेष रूप से पढ़ो — ये कालभैरव के दिन हैं। भैरव अष्टमी — मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी — को विशेष पाठ करो।
सुबह या रात में पढ़ो। काले तिल, सरसों, नींबू और सरसों का तेल कालभैरव को प्रिय है। कालभैरव की मूर्ति के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाओ।
पाठ के बाद ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं का जप करो।
अंत में
कालभैरव अष्टकम् में एक पंक्ति है —
“मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणम्।”
मृत्यु के दर्प का नाश। कराल दाँतों से मोक्ष।
जो सबसे भयंकर लगता है — वही सबसे बड़ा मोक्षदाता है।
यही कालभैरव का रहस्य है। उनका भयंकर रूप हमें डराने के लिए नहीं — जगाने के लिए है। जब काल का सामना करते हो — तो जीवन का असली मूल्य समझ आता है।
और जब कालभैरव की शरण लेते हो — तो काल भी पीछे हट जाता है।
जय कालभैरव।
ॐ नमः कालभैरवाय
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