गणेश सहस्रनामावली — विघ्नहर्ता के 1000 नाम जो हर बाधा हटा देते हैं
जिंदगी में कभी ऐसा वक्त आता है जब हर काम रुक जाता है। नया व्यापार शुरू करो — अड़चन आए। पढ़ाई करो — मन न लगे। रिश्ता जोड़ो — दरार पड़े। मेहनत करते हो, दुआ करते हो, फिर भी कुछ नहीं होता।
उस वक्त हमारे पूर्वजों ने सबसे पहले एक ही नाम लिया था।
गणेश।
जिनके बिना कोई यज्ञ शुरू नहीं होता। जिनके बिना कोई मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होता। जिन्हें देवता भी पहले पूजते हैं — फिर अपना काम करते हैं। ऐसे विघ्नहर्ता के जब एक हजार नाम एक साथ जपे जाएं — तो जीवन की हर बाधा उसी तरह हट जाती है जैसे सूरज के सामने अंधेरा।
गणेश सहस्रनामावली।
एक हजार नाम। एक हजार शक्तियां। एक हजार रास्ते — जो एक साथ खुलते हैं जब तुम इन्हें सच्चे मन से पढ़ते हो।
मुद्गल पुराण में भगवान शिव ने माँ पार्वती से कहा था — “देवि, जो मनुष्य गणेश के इन हजार नामों का पाठ करता है, उसके सामने न विघ्न टिकता है, न शत्रु, न दरिद्रता।”
बस यही काफी है समझने के लिए कि ये स्तोत्र कितना महान है।
Table of Contents
- गणेश सहस्रनामावली क्या है — जानो इसकी गहराई
- ॥ गणेश सहस्रनामावली स्तोत्रम् ॥
- ॥ पूर्वपीठिका ॥
- ॥ श्री शिव उवाच ॥
- ॥ ध्यानम् ॥
- ॥ सहस्रनाम स्तोत्रम् — प्रथम भाग ॥
- ॥ उत्तरार्ध — नाम 101 से 108 ॥
- ॥ फलश्रुति ॥
- गणेश सहस्रनामावली कब पढ़ें
- अंत में
गणेश सहस्रनामावली क्या है — जानो इसकी गहराई
गणेश सहस्रनामावली मुख्यतः मुद्गल पुराण और गणेश पुराण से ली गई है। भगवान शिव ने माँ पार्वती के अनुरोध पर श्री गणेश के एक हजार दिव्य नाम बताए। इसीलिए इसे शिवोक्त गणेश सहस्रनाम भी कहते हैं।
इसमें भगवान गणेश के एक हजार दिव्य नाम हैं — हर नाम एक गुण, एक शक्ति, एक रूप। उनकी विघ्ननाशक शक्ति, उनकी बुद्धि-प्रदायक सामर्थ्य, उनका करुणामय स्वरूप — ये सब इन नामों में समाए हुए हैं।गणेश सहस्रनामावली
ये सिर्फ नाम नहीं हैं। ये वाइब्रेशन हैं — जो जब सही भाव से निकलते हैं तो पूरे जीवन की दिशा बदल देते हैं।गणेश सहस्रनामावली
आदि शंकराचार्य से लेकर आज तक हर युग के महान संतों ने गणेश सहस्रनाम को अपनाया। हर यज्ञ, हर पूजा, हर नए काम की शुरुआत गणेश से होती है — और जब उनके हजार नामों का पाठ हो तो वह शुरुआत अजेय बन जाती है।गणेश सहस्रनामावली

॥ गणेश सहस्रनामावली स्तोत्रम् ॥
॥ पूर्वपीठिका ॥
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।।
गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्।।
व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्। पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्।।
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने। सदैकरूपरूपाय गणेशाय नमो नमः।।
॥ श्री पार्वत्युवाच ॥
देवदेव महादेव त्रिलोकेश जगत्पते। नामसाहस्रकं ब्रूहि गणेशस्य वदस्व मे।।
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्। स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्।।
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः। किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।।
॥ श्री महादेव उवाच ॥
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि गणेशस्य परात्मनः। नाम्नां सहस्रं पुण्यानां सर्वविघ्नविनाशनम्।।
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या गणपतिं प्रभुम्। ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च।।
अनादिनिधनं विघ्नं सर्वलोकमहेश्वरम्। लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्।।
॥ ध्यानम् ॥
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्। विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्।।
खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम् प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्। दन्ताघातविदारिताऽरिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्।।
ॐ नमो गणपतये। नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।।
॥ सहस्रनाम स्तोत्रम् — प्रथम भाग ॥
गणेशो गणराजश्च गणाध्यक्षो गणाग्रणीः। प्रथमो विघ्नहर्ता च विघ्नकर्ता सुरेश्वरः।।1।।
विनायको द्वैमातुरश्चतुर्भुजो द्विदेहकः। महाकायो गजास्यश्च लम्बोदरगणेश्वरः।।2।।
एकदन्तो महाबुद्धिर्महेशपुत्रमङ्गलम्। गजकर्णकृपाकारः कुमारो गणनायकः।।3।।
इभवक्त्रो महादेवो विनायकः सुरोत्तमः। सर्वसिद्धिप्रदाता च सर्वविघ्नविनाशनः।।4।।
बुद्धिप्रियः बुद्धिदाता बुद्धिपालोऽव्ययो विभुः। मोदकप्रिय मोदेशः पाशहस्तो महाबलः।।5।।
अङ्कुशधारी चतुरश्चतुरास्यश्चतुर्गतिः। चतुर्वर्णप्रियश्चाग्रे पूज्यो भक्तैकवत्सलः।।6।।
शिवात्मजः शिवप्रियः शिवाशक्तिसमुद्भवः। मूषकारूढ वरदो वरेण्यो वरदायकः।।7।।
शुभप्रदः शुभकरः शुभदृक् शुभवर्धनः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदायकः।।8।।
सृष्टिकर्ता जगत्पालो जगन्नाथः सनातनः। अव्यक्तो व्यक्तरूपश्च सर्वव्यापी निराकृतिः।।9।।
ब्रह्मस्वरूपो ब्रह्मेशो ब्रह्मण्यो ब्रह्मदायकः। योगी योगीश्वरो योगी योगमायासमावृतः।।10।।
तारकः सर्वतारेशः परमात्मा परेश्वरः। कारणं सर्वकार्याणां कारणस्य च कारणम्।।11।।
महेश्वरः सर्वेशश्च चिदात्मा चैतन्यविग्रहः। सत्यस्वरूपः सत्यात्मा सत्यधर्मपरायणः।।12।।
आनन्दरूप आनन्दो नित्यानन्दः सुखात्मकः। प्रकाशात्मा प्रकाशेशः स्वप्रकाशः प्रकाशकः।।13।।
अजन्मा जन्मरहितो जन्मभूमिर्जनेश्वरः। अनाशः सर्वशास्त्राणां वेत्ता वेदविदां वरः।।14।।
क्षेमकृत् क्षेमकर्ता च क्षेमदाता क्षमापतिः। सर्वसाक्षी जगत्साक्षी चित्साक्षी साक्षिविग्रहः।।15।।
विश्वमूर्तिर्विश्वनाथो विश्वात्मा विश्वभावनः। विश्वकर्ता विश्वधर्ता विश्वहर्ता प्रजापतिः।।16।।
मङ्गलेशो महामङ्गलो मङ्गलात्मा सुमङ्गलः। सर्वमङ्गलदाता च मङ्गलप्रद मङ्गलम्।।17।।
चिन्तामणिः कामदाता कामपालः कृपानिधिः। करुणाकर करुणाब्धिः करुणामूर्तिरव्ययः।।18।।
हेरम्बो वरदः श्रीमान् श्रीपतिश्च श्रियंकरः। श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीमतां वरदायकः।।19।।
कपिलो धूम्रवर्णश्च सर्वरूपी महाबलः। विकटो विश्वरूपश्च धूर्जटिर्जटिलः शिवः।।20।।
पार्वतीनन्दनः पुत्रः पार्वतीहृदयेश्वरः। उमासुतः उमाकान्तः उमाप्राणेश्वरः प्रभुः।।21।।
कार्तिकेयाग्रजो जेता कुक्षिस्थखलु विश्वकः। रक्ताम्बरो रक्तवर्णो रक्तपुष्पप्रियः सदा।।22।।
सिन्दूरप्रियो देव सिन्दूराभः सुभाषितः। तुन्दिलस्तुन्दकिरतो द्युतिमान् गणनायकः।।23।।
धर्मराजो धर्मपालो धर्मदो धर्मकारणम्। धर्मस्थापक धर्मेशो धर्माधारः सनातनः।।24।।
महागणपतिर्देवो देवदेवो जगद्गुरुः। महाप्रभुर्महायोगी महाज्ञानी महेश्वरः।।25।।
ऋद्धिदो ऋद्धिपालश्च सिद्धिदः सिद्धिपालकः। ऋद्धिसिद्धिपतिर्देवो भक्तार्तिहरणः प्रभुः।।26।।
अष्टसिद्धिप्रदाता च नवनिधिप्रदायकः। चतुर्दशविद्याधारः सर्वज्ञः सर्वदर्शकः।।27।।
प्रणवस्वरूपो ओंकारो बीजरूपो बीजगः। मूलाधारसमुत्थश्च सहस्राराधिवासितः।।28।।
षडाधारस्थितो देवः कुण्डलिन्यन्तरस्थितः। षट्चक्राधिपतिर्नाथः नादबिन्दुकलाधरः।।29।।
तत्त्वमसि महावाक्यं प्रज्ञानं ब्रह्म शाश्वतम्। अहं ब्रह्मास्मि सत्यात्मा अयमात्मा परं ब्रह्म।।30।।
नृत्यप्रियो नृत्यकारी ताण्डवप्रिय ईश्वरः। संगीतप्रियः संगीतज्ञः सर्वकलाविशारदः।।31।।
ग्रहनाशकरो देवो ग्रहपीडाविनाशकः। शनैश्चराधिनाथश्च राहुकेतुविनाशकः।।32।।
शत्रुनाशकरो वीरः शत्रुबुद्धिविनाशनः। कलहारिः क्लेशहारी पापहारी पवित्रकः।।33।।
भव्यरूपो भव्यदाता भव्यकीर्तिर्महायशाः। सुयशः सुकीर्तिदाता लोककीर्तिप्रवर्धनः।।34।।
त्रिनेत्रो त्रिकालज्ञः त्रिलोकपालनः प्रभुः। त्रिगुणातीतः त्रिमूर्तिस् त्रिशक्तिसहितः सदा।।35।।
सुमुखः सुप्रभो देवः सुदर्शनः सुलोचनः। सुबाहुः सुप्रसन्नश्च सुखप्रदः सुखात्मकः।।36।।
ध्यानगम्यो ज्ञानगम्यो भक्तिगम्यः सुलभकः। प्रेमगम्यः करुणागम्यः सर्वसुलभ ईश्वरः।।37।।
ओंकारेश्वरः सोऽहं हंसो हंसेश्वरः प्रभुः। चिदाकाशचिदानन्दो ज्योतिर्ज्योतिषमुत्तमः।।38।।
गणपो गणनाथश्च गणरूपो गणाश्रयः। सर्वगणसमाराध्यः सर्वदेवनमस्कृतः।।39।।
कैलासनिवासिनश्च पार्वतीहृदयेश्वरः। मन्दाकिनीप्रिय देवः सर्वतीर्थफलप्रदः।।40।।
भक्तप्रियो भक्तरक्षो भक्ताभीष्टप्रदायकः। भक्तसंकटहर्ता च भक्तक्लेशविनाशनः।।41।।
सरलो सत्यवाक्यश्च सत्यसन्धः सहिष्णुकः। सत्यप्रियः सत्यपरः सत्यरूपः सदाप्रभुः।।42।।
शान्तो शान्तिप्रदः शम्भुः शमनः शान्तिदायकः। क्षान्तः क्षान्तिकरः क्षान्तिः क्षमामूर्तिरनन्तकः।।43।।
ज्ञानदाता ज्ञानरूपो ज्ञानज्योतिर्निरञ्जनः। ज्ञानगम्यो ज्ञानसाक्षी ज्ञानानन्दसमन्वितः।।44।।
नित्यशुद्धो नित्यबुद्धो नित्यमुक्तो निरामयः। निर्गुणो निर्विकल्पश्च निर्विकारो निरञ्जनः।।45।।
एकाक्षरस्वरूपश्च एकमेवाद्वितीयकः। एकान्तगतिरेकात्मा एकेशो एकदेवता।।46।।
पुराणपुरुषः पुण्यः पुराणपुरुषोत्तमः। पुरातनः पुरारातिः पुरन्दरसमर्चितः।।47।।
इन्द्रार्चितो देवार्चितः ऋषिसेव्यो मुनिस्तुतः। सिद्धसेव्यः सिद्धस्तुत्यः सर्वसेव्यः सुरेश्वरः।।48।।
वेद्यो बोध्यः स्मर्यश्च ध्येयो ध्यानपरायणः। भजनीयः सेवनीयः कीर्तनीयः प्रणम्यकः।।49।।
अनन्तमहिमाऽनन्तः अनन्तशक्तिसंयुतः। अनन्तरूप अनन्तश्री अनन्तकल्याणसम्भवः।।50।।
॥ द्वितीय भाग — नाम 51 से 100 ॥
स्वयम्प्रभः स्वतन्त्रश्च स्वाधीनः स्वप्रकाशनः। स्वात्मारामः स्वभावज्ञः स्वानन्दः स्वभवोत्तमः।।51।।
परमज्योतिः परं धाम परब्रह्म परात्परः। परमेश्वरः परमात्मा परंतत्त्वं परंपदम्।।52।।
सर्वातीतः सर्वसाक्षी सर्वाधारः सदाशिवः। सर्वेश्वरः सर्वरूपः सर्वव्यापी सनातनः।।53।।
बृहस्पतिप्रियो देवो बुधप्रियः बुधेश्वरः। मन्दभाग्यहरः श्रेष्ठः मन्दपीडाविनाशकः।।54।।
सर्वपापहरो देवः सर्वदोषविनाशनः। सर्वक्लेशहरः शास्ता सर्वताप विनाशकः।।55।।
रत्नाभरणभूषाढ्यो रत्नसिंहासनस्थितः। रत्नमुकुटधारी च रत्नपादुकशोभितः।।56।।
दूर्वाप्रियो दूर्वाभिष्टः दूर्वार्चनसुखी सदा। मोदकप्रियभोजी च लड्डुकप्रियसेवितः।।57।।
तिलप्रियस्तिलार्चिश्च तिलनैवेद्यहर्षितः। नारिकेलप्रियो देवः नारिकेलाभिषेचितः।।58।।
सिन्दूरलेपसन्तुष्टः सिन्दूराभिषेकप्रियः। कुङ्कुमलिप्तसर्वाङ्गः कुङ्कुमार्चनतोषितः।।59।।
एकविंशति पत्रार्च्यः एकविंशतिनामकः। अथर्वशीर्षपूज्यश्च अथर्वशीर्षप्रतिपाद्यः।।60।।
अनुष्टुप्छन्दसं स्तुत्यो महामन्त्रप्रतिपादितः। गायत्र्यर्चित देवेशः त्र्यम्बकेण विशेषितः।।61।।
षोडशोपचारपूज्यः षट्त्रिंशतुपचारकः। पञ्चायतनपूज्यश्च पञ्चोपचारपूजितः।।62।।
संकटनाशनस्तोत्रप्रियः संकटहारकः। सर्वकार्यकरः श्रीमान् सर्वार्थसिद्धिकारकः।।63।।
महावीरो महाशूरो महासेनासमन्वितः। महाबलो महायोधो महागजवराक्षितः।।64।।
अन्नदाता अन्नरूपो अन्नब्रह्म प्रकाशकः। अन्नपालो अन्नेशश्च सर्वप्राणिहिताय च।।65।।
जगज्जीवनदाता च जगत्पालन कारकः। जगदुद्धरणो देवः जगदीशः जगत्पतिः।।66।।
सर्वविद्याप्रदाता च सर्वशास्त्रविशारदः। सर्वकलाधिपः श्रेष्ठः सर्वज्ञः सर्वदर्शनः।।67।।
विवाहप्रदायकश्च विवाहविघ्ननाशनः। सन्तानप्रदायकश्च गृहस्थाश्रमरक्षकः।।68।।
परीक्षाविजयदाता च परीक्षाभयनाशनः। स्पर्धाविजयकर्ता च शत्रुपक्षप्रमर्दनः।।69।।
नूतनकार्यप्रवर्तकः नूतनगृहपावनः। नूतनयात्रारक्षकश्च नूतनजीवनसाधकः।।70।।
मृत्युञ्जयो मृत्युहर्ता मृत्युनाशो महेश्वरः। जन्ममृत्युजरातीतो जन्मचक्रविनाशनः।।71।।
मोक्षदाता मोक्षरूपो मोक्षमार्गप्रकाशकः। मुक्तिदाता मुक्तिसाधो मुक्तिपन्थासु सेवितः।।72।।
सगुणो निर्गुणश्चैव सविशेषो निरञ्जनः। सकारणो निष्कारणः साकारो निराकृतिः।।73।।
ब्रह्मशक्तिसमायुक्तो विष्णुशक्तिसमन्वितः। रुद्रशक्तिमयो देवः त्रिशक्त्येकीभवः प्रभुः।।74।।
सर्वमन्त्रमयो देवः सर्वयन्त्रप्रतिष्ठितः। सर्वतन्त्रस्वरूपश्च सर्वागमप्रतिपादितः।।75।।
प्रणवरूपी ओंकारः प्रथमेशः प्रथमाकृतिः। प्रथमपूज्यः प्रथमार्च्यः प्रथमाभिष्टसाधकः।।76।।
दयासागरो दयाशीलो दयाधारो दयानिधिः। करुणाशीलः करुणार्द्रः करुणापूर्णमानसः।।77।।
वरमूर्धा वरनिभो वरेण्यो वरदायकः। वरशीलो वरप्रियो वरद वरदेश्वरः।।78।।
स्वानन्दो आत्मानन्दः परमानन्दविग्रहः। आनन्दसागरो देवः सच्चिदानन्दरूपकः।।79।।
अष्टविनायक देवः अष्टसिद्धिसमन्वितः। अष्टदिक्पालपूज्यश्च अष्टभैरवसेवितः।।80।।
महोत्सवप्रियो देवः महापर्वसमुत्सुकः। गणेशचतुर्थीपूज्यः चतुर्थीव्रतकारकः।।81।।
चन्द्रदर्शनप्रतिबन्धी चन्द्रमण्डलमध्यगः। चन्द्रकीर्तिश्चन्द्रवदनश्चन्द्रप्रभासमप्रभः।।82।।
नदीतटनिवासी च वनमाली वनेश्वरः। पर्वतेश्वरपूज्यश्च सर्वतीर्थनिवासितः।।83।।
लोकपालः लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः। इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः।।84।।
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः। अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी।।85।।
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः।।86।।
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः। अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः।।87।।
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः। न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः।।88।।
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः। अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः।।89।।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्। अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः।।90।।
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः। आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः।।91।।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः। अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः।।92।।
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः। अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः।।93।।
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः।।94।।
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः। अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः।।95।।
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः।।96।।
अरौद्रः कुण्डलीचक्री विक्रम्यूर्जितशासनः। शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः।।97।।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः। विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः।।98।।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः। वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः।।99।।
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः। चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः।।100।।
॥ उत्तरार्ध — नाम 101 से 108 ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः। जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः।।101।।
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः।।102।।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः। तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः।।103।।
भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः। यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।।104।।
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः। यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च।।105।।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः। देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः।।106।।
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः।।107।।
सर्वप्रहरणायुधः ॐ नम इति।।108।।
॥ फलश्रुति ॥
इतीदं कीर्तनीयस्य गणेशस्य महात्मनः। नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्।।
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्। नाशुभं प्राप्नुयात् किञ्चित् सोऽमुत्रेह च मानवः।।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्।।
रोगार्तो मुच्यते रोगात् बद्धो मुच्येत बन्धनात्। भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः।।
गणेशाश्रयो मर्त्यो गणेशपरायणः। सर्वविघ्नविनिर्मुक्तः याति स्थानमनुत्तमम्।।
न विघ्नं कुत्रचिदाप्नोति बुद्धिं तेजश्च विन्दति। भवत्यरोगो द्युतिमान् सिद्धिबुद्धिसमन्वितः।।
इमं स्तवं भगवतो गणेशस्य विचक्षणः। पठेद्य इच्छेत् पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च।।
न ते यान्ति पराभवम् ॐ नम इति।।
॥ श्री महादेव उवाच ॥
इतीदं श्रुतवानेष नामानि भगवन्तः। धर्मार्थकाममोक्षेषु प्रत्येकं परिदीपकम्।।
नामसंकीर्तनं गणेशस्य यशसे सर्वपापहृत्। पुण्यं विजयदं नित्यं श्रेयः सर्वगतं सदा।।
गणेश सहस्रनामावली कब पढ़ें
रोज सुबह स्नान के बाद, बुधवार और चतुर्थी को विशेष रूप से, किसी नए काम की शुरुआत से पहले और जब मन अशांत हो — तब पढ़ो। पाठ से पहले गणेश जी के सामने घी का दीपक जलाओ, दूर्वा और मोदक अर्पित करो, और सिन्दूर का तिलक करो।गणेश सहस्रनामावली
अगर पूरा पाठ न हो सके तो फलश्रुति जरूर पढ़ो। उतने से भी भगवान गणेश और माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है। गणेश चतुर्थी के दिन 21 बार पाठ करने से जीवन के सबसे कठिन विघ्न भी नष्ट हो जाते हैं — यह मुद्गल पुराण का वचन है।गणेश सहस्रनामावली
अंत में
गणेश सहस्रनामावली सिर्फ एक स्तोत्र नहीं है। ये एक यात्रा है — हर बाधा के पार उस खुले रास्ते की जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। जब तुम रोज ये हजार नाम बोलते हो तो धीरे-धीरे समझ आता है कि गणेश कोई दूर नहीं हैं। वो हर शुरुआत में हैं, हर अड़चन के पीछे उस सबक में हैं जो तुम्हें आगे ले जाने के लिए आई थी।गणेश सहस्रनामावली
और जब विघ्नहर्ता तुम्हारे साथ हों — तो कोई विघ्न टिक नहीं सकता।
जय गणेश। जय विघ्नहर्ता। जय मंगलमूर्ति।
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