नारायण कवचम् — वो दिव्य सुरक्षा कवच जो देवताओं ने भी माँगा था
जिंदगी में कभी ऐसा लगता है ना —
चारों तरफ से मुसीबतें आ रही हैं। एक समस्या खत्म नहीं होती तो दूसरी आ जाती है। घर में कलह, बाहर परेशानी, मन में डर। लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति हर कदम पर रोक रही है।
उस वक्त क्या करें?
हमारे पूर्वजों ने इसका जवाब हजारों साल पहले दे दिया था।
नारायण कवचम्।
श्रीमद्भागवत के छठे स्कंध में ये दिव्य कवच है। ये वो कवच है जो देवराज इंद्र ने महर्षि विश्वरूप से माँगा था — जब देवता और असुरों का युद्ध हो रहा था और देवता हार रहे थे।
सोचो — जब स्वयं इंद्र को सुरक्षा चाहिए थी तो उन्होंने नारायण कवचम् माँगा। तो हम साधारण इंसानों के लिए इसकी शक्ति का अंदाजा लगाओ।
ये सिर्फ एक स्तोत्र नहीं है। ये एक दिव्य कवच है — भगवान विष्णु के दस अवतारों की शक्ति से बना हुआ। जो इसे पढ़ता है उसके चारों तरफ एक अटूट सुरक्षा का घेरा बन जाता है।
नारायण कवचम् की कहानी — कैसे मिला ये कवच
श्रीमद्भागवत में कथा है —
देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। देवता बार-बार हार रहे थे। इंद्र घबराए हुए महर्षि विश्वरूप के पास गए और बोले — “हे महर्षि! हमें कोई ऐसा कवच दो जो हमें अजेय बना दे।”
महर्षि विश्वरूप ने मुस्कुराकर कहा — “इंद्र! मैं तुम्हें नारायण कवचम् सिखाता हूँ। ये भगवान विष्णु का दिव्य कवच है। इसे धारण करने वाले को कोई भी शक्ति हरा नहीं सकती।”
इंद्र ने वो कवच सीखा। देवताओं ने उस कवच की शक्ति से युद्ध जीता।
वही कवच आज हमारे पास है — नारायण कवचम्।
॥ नारायण कवचम् ॥
॥ पूर्वपीठिका ॥
ॐ नमो नारायणाय।
श्री शुक उवाच —
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः।
वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनः।
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः।।
जिनकी स्तुति ब्रह्मा, वरुण, इंद्र, रुद्र और मरुत दिव्य स्तवों से करते हैं, जिन्हें सामगान गाने वाले वेदों से गाते हैं, जिन्हें योगीजन ध्यान में देखते हैं, जिनका अंत देव और असुर भी नहीं जानते — उन भगवान को नमस्कार।
॥ विनियोग ॥
ॐ अस्य श्री नारायण कवच स्तोत्र मन्त्रस्य।
श्री विश्वरूप ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः।
श्री महाविष्णुः देवता।
श्री महाविष्णु प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।।
॥ करन्यास ॥
ॐ विष्णवे नमः — अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ नारायणाय नमः — तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ माधवाय नमः — मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ गोविन्दाय नमः — अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ विष्णवे नमः — कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ श्री महाविष्णवे नमः — करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।।
॥ हृदयादि न्यास ॥
ॐ विष्णवे नमः — हृदयाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः — शिरसे स्वाहा।
ॐ माधवाय नमः — शिखायै वषट्।
ॐ गोविन्दाय नमः — कवचाय हुम्।
ॐ विष्णवे नमः — नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ श्री महाविष्णवे नमः — अस्त्राय फट्।
भूर्भुवः सुवरोम् इति दिग्विमोकः।।
॥ ध्यानम् ॥
विश्वं पूर्णसुखं ब्रह्म ज्ञानमानन्दमव्ययम्।
शान्तं सर्वगतं नित्यं ब्रह्म ध्यायेन्मुमुक्षुः।।ध्यायेत् पद्मासनस्थं विकसितवदनं पद्मपत्रायताक्षम्।
हेमाभं पीतवस्त्रं करकमललसत्केमकमालाभिरामम्।।
सर्वालंकारयुक्तं सततमभयदं भक्तनम्राङ्घ्रिपद्मम्।
विष्णुं विश्वाधिपं तं शरणदमभयं ध्यायते योगिवर्यः।।
जो पद्मासन में बैठे हैं, जिनका मुख खिला हुआ है, जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी हैं, जो सोने जैसी आभा वाले हैं, पीले वस्त्र पहने हैं, हाथों में कमल की माला है, सभी आभूषणों से युक्त हैं, सदा अभय देते हैं — उन विश्वाधिप विष्णु का ध्यान योगीजन करते हैं।नारायण कवचम्
॥ मुख्य कवचम् ॥
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां।
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।।
दरारिचर्माऽसिगदेषुचापाश्।
पाणिस्पृशन्नाशु भजत्रिलोकीम्।।1।।
गरुड़ की पीठ पर चरण कमल रखे, शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण और धनुष को हाथों में धारण किए भगवान हरि तीनों लोकों में विचरण करते हुए मेरी सब प्रकार से रक्षा करें।नारायण कवचम्
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिः।
यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात्।।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्।
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः।।2।।
जल में मछली के रूप वाले मत्स्य अवतार जलजीवों और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें। स्थल पर माया-वटु वामन रक्षा करें। आकाश में त्रिविक्रम विश्वरूप रक्षा करें।नारायण कवचम्
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः।
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः।।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं।
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः।।3।।
दुर्गम स्थानों में, जंगलों में, युद्धभूमि में — जिनके महाट्टहास से दिशाएं गूंज उठीं और गर्भ गिर गए — वो नृसिंह भगवान असुर-यूथपति के विरुद्ध मेरी रक्षा करें।नारायण कवचम्
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः।
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे।
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजो माम्।।4।।
मार्ग में यज्ञ स्वरूप वराह भगवान जिन्होंने अपनी दाढ़ से पृथ्वी उठाई थी, वो मेरी रक्षा करें। पर्वतों की चोटियों पर और परदेस में भरत के बड़े भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम मेरी रक्षा करें।नारायण कवचम्
मामुग्रधर्माद् अखिलात् प्रमादात्।
नारायणः पातु नरश्च हासात्।।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः।
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात्।।5।।
उग्र धर्म और सभी प्रमादों से नारायण और नर मेरी रक्षा करें। हास्य से दत्तात्रेय रक्षा करें। योगनाथ और गुणेश कपिल कर्मबंधन से मेरी रक्षा करें।
सनत्कुमारो वतु कामदेवात्।
हयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्।
कूर्मो हरिर्माऽवतु कर्मभ्यः।।6।।
काम से सनत्कुमार रक्षा करें। मार्ग में देव-अपमान से हयग्रीव रक्षा करें। देवर्षि श्रेष्ठ पुरुष-पूजा से रक्षा करें। कर्मों के फंदे से कूर्म हरि रक्षा करें।नारायण कवचम्
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद्।
द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद्।
बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः।।7।।
अपथ्य से धन्वन्तरि भगवान रक्षा करें। द्वंद्व और भय से जितेन्द्रिय ऋषभदेव रक्षा करें। लोकों और मृत्यु से यज्ञ भगवान रक्षा करें। असुरों के समूह और क्रोध से बलराम और शेषनाग रक्षा करें।नारायण कवचम्
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्।
बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात्।।
कल्किः कलेः कालमलात् प्रपातु।
धर्मावनायोरुकृतावतारः।।8।।
अज्ञान से भगवान व्यास रक्षा करें। पाखंड और प्रमाद से बुद्ध भगवान रक्षा करें। कलिकाल के पापों से — धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेने वाले — कल्कि भगवान रक्षा करें।नारायण कवचम्
मां केशवो गदया प्रातरव्यात्।
गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्तिः।
मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः।।9।।
प्रातःकाल गदा धारण किए केशव मेरी रक्षा करें। प्रातःकाल के दूसरे पहर में बाँसुरी बजाते गोविंद रक्षा करें। पूर्वाह्ण में उदात्त शक्ति वाले नारायण रक्षा करें। मध्याह्न में चक्रधारी विष्णु रक्षा करें।
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा।
सायं त्रिधामाऽवतु माधवो माम्।।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे।
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः।।10।।
अपराह्ण में प्रचंड धनुष वाले मधुहा मेरी रक्षा करें। संध्या काल में त्रिधामा माधव रक्षा करें। रात्रि के प्रथम पहर में हृषीकेश रक्षा करें। अर्धरात्रि में एकमात्र पद्मनाभ रक्षा करें।
श्रीवत्सधामाऽपररात्र ईशः।
प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते।
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः।।11।।
रात्रि के अंतिम पहर में श्रीवत्स के धाम ईश्वर रक्षा करें। प्रभात काल में तलवार धारण किए जनार्दन रक्षा करें। संध्याकाल में दामोदर रक्षा करें। काल के स्वामी विश्वेश्वर भगवान सदा रक्षा करें।
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि।
भ्रमत् समन्तादभिरक्षतु मां।।
फणीन्द्रपाशो धनुरैन्द्रचापो।
यथाऽऽशयोर्वीं दलयन् विभाति।।12।।
युगान्त की अग्नि जैसी तीखी धार वाला चक्र चारों तरफ घूमता हुआ मेरी रक्षा करे। शेषनाग का पाश और इंद्रधनुष पृथ्वी को धारण करते हुए सुशोभित हों।
कौमोदकी विष्णुगदा श्रिमत्ता।
दूर्वां दुर्विषहा दुरासदा मे।।
विद्याधरोपास्यपदाब्जयुग्मा।
रक्षन्तु पार्श्वे शरणार्थिनं माम्।।13।।
शोभायमान विष्णु की गदा कौमोदकी — जो दुर्जेय और दुर्लभ है — मुझे शत्रुओं से दूर रखे। विद्याधरों द्वारा पूजित चरणकमलों वाले भगवान मेरे पार्श्वों में शरण माँगने वाले की रक्षा करें।
पाञ्चजन्यो भगवदीय एनं।
पाशान्विमुञ्चन् भयभीतमीशः।।
आपूर्यमाणो विबुधानुकूलः।
सदा मनोरथमवाप्नुयां मे।।14।।
भगवान का शंख पांचजन्य — भय से डरे हुए को पाशों से मुक्त करता हुआ — देवताओं के अनुकूल होकर सदा मेरी मनोकामना पूर्ण करे।
सुपर्णो मे भयहृत् सर्वतोऽव्यात्।
नेत्रे च मां नासिकयोश्च रक्षेत्।।
देवर्षिभिः पूजितपादपद्मः।
कण्ठे च मे श्रीपतिरव्यतां सः।।15।।
गरुड़ मेरे भय को हरें और सब तरफ से रक्षा करें। मेरी आँखों और नासिका की रक्षा करें। देवर्षियों द्वारा पूजित चरणकमल वाले श्रीपति मेरे कंठ की रक्षा करें।
श्रियः पतिः श्रीमत आत्मनः प्रभुः।
मनोगतिं वाणिमिमां गिरं माम्।।
गुल्फौ च जङ्घे च पुरुः परात्मा।
पायात् सुपार्श्वः श्रियमात्मनीनाम्।।16।।
श्री के पति, श्रेष्ठ आत्माओं के प्रभु मेरे मन की गति और वाणी की रक्षा करें। मेरी एड़ियों और पिंडलियों की परमात्मा रक्षा करें। सुपार्श्व अपनी श्री की रक्षा करें।
विष्वक्सेनः पात्वपि सन्निधानात्।
सर्वायुधैर्भगवान् पातु विष्णुः।।
भगवानात्मा सहितः समाम्।
पादौ पुनीयादभिधावतां नः।।17।।
विष्वक्सेन सभी संकटों से रक्षा करें। सभी आयुधों से सुसज्जित भगवान विष्णु रक्षा करें। भगवान अपनी शक्तियों सहित मेरे पैरों को पवित्र करें।
सर्वाङ्गं मे भगवान् पातु सर्वः।
यन्नाम कीर्त्यमाखिलाघौघनाशनम्।।
सप्रश्रयं सह रक्षोगणेन।
बद्धाञ्जलिस्त्वां शरणं प्रपद्ये।।18।।
भगवान जिनका नाम सभी पापों को नष्ट करने वाला है — वो मेरे सभी अंगों की रक्षा करें। राक्षस-गण सहित हाथ जोड़कर मैं आपकी शरण लेता हूँ।
यद्यत्रजन्म परदेवतया मे।
भवेत् क्वचित् क्षीण इवाम्बरं यत्।।
ततो विशुद्धं भगवत्सनेहात्।
पुनर्मम स्यादुत सत्यसंगः।।19।।
इस और अन्य जन्मों में जो भी पाप-कर्म हुए हों — भगवान के प्रेम से वो सब शुद्ध हो जाएं। और मुझे सत्य का संग मिले।
॥ फलश्रुति ॥
इदं महापुण्यमलं पवित्रं।
धन्यं यशस्यं पदमायुरुद्यत्।।
प्रातः पठेत् पुरुषोऽनु स्मरेच्च।
विष्णोर्दिनं पुण्यतमं प्रयाति।।
यह महापुण्य, पवित्र, धन्य, यशस्वी और आयुवर्धक स्तोत्र है। जो पुरुष इसे प्रातःकाल पढ़े और स्मरण करे — उसका दिन विष्णु की कृपा से पुण्यमय बीतता है।
युद्धेषु चान्येषु भयेषु नित्यं।
यो धारयेत् तं मणिमेव पुंसाम्।।
व्यापादयेत्तान् रिपुसैन्यनाथान्।
याति भयं नाशयति ह्यशेषम्।।
युद्ध में और अन्य भयों में जो इसे मणि की तरह धारण करे — वो शत्रु-सेनाओं को परास्त करता है और समस्त भय नष्ट हो जाते हैं।
एतत् पठित्वा स्मृत्वा नित्यं।
कीर्तयन् भक्तिमान् भवेत्।।
सर्वपापैः प्रमुच्येत।
विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात्।।
इसे नित्य पढ़ने, स्मरण करने और कीर्तन करने से मनुष्य भक्तिमान बनता है। सभी पापों से मुक्त होता है और भगवान विष्णु की सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
नारायण कवचम् की शक्ति — दस अवतारों की सुरक्षा
नारायण कवचम् की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें भगवान विष्णु के दस अवतार — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि — सभी एक साथ कवच बनकर तुम्हारी रक्षा करते हैं।
सुबह से रात तक — हर पहर में एक अलग रूप में भगवान तुम्हारे साथ हैं। ये सिर्फ स्तोत्र नहीं, एक पूरी सुरक्षा व्यवस्था है।
जल में मत्स्य। स्थल पर वामन। आकाश में त्रिविक्रम। जंगल में नृसिंह। युद्ध में चक्रधारी विष्णु। — हर जगह, हर हाल में, हर पल भगवान तुम्हारे साथ हैं।
कब और कैसे पढ़ें
नारायण कवचम् का पाठ सबसे ज्यादा फलदायी है — सुबह स्नान के बाद शुद्ध आसन पर बैठकर पढ़ो। एकादशी को विशेष रूप से पढ़ो। जब कोई बड़ा संकट हो, घर में नकारात्मक ऊर्जा लगे, यात्रा पर जाना हो — तब जरूर पढ़ो।
न्यास करते वक्त हाथ के अंगों को स्पर्श करो। इससे कवच शरीर में उतरता है।
अंत में
इंद्र ने जब ये कवच माँगा था — वो एक राजा थे, देवताओं के स्वामी थे। फिर भी उन्हें सुरक्षा की जरूरत पड़ी।
हम साधारण इंसान हैं। हमें तो और भी ज्यादा जरूरत है।
लेकिन सबसे बड़ी बात ये है — ये कवच तुम्हारे लिए हमेशा से तैयार है। भगवान नारायण हमेशा से तुम्हारे साथ खड़े हैं। बस एक बार पुकारो।
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