शिव तांडव स्तोत्र — वो स्तुति जो रावण ने लिखी और कैलाश हिल गया
सोचो एक पल —
एक इंसान इतना शक्तिशाली हो कि उसने कैलाश पर्वत को उठा लिया। दस सिर, बीस हाथ, तीनों लोकों का विजेता। और उस महाबली ने जब भगवान शिव की स्तुति लिखी — तो वो इतनी प्रचंड थी कि खुद शिवजी का दिल पिघल गया।
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ये है शिव तांडव स्तोत्र।
रावण — जिसे हम सिर्फ खलनायक समझते हैं — वो असल में एक महापंडित था, शिव का परम भक्त था। जब उसने कैलाश उठाया और माँ पार्वती घबराईं — शिवजी ने अपने अंगूठे से पर्वत दबाया और रावण का हाथ फंस गया। तब उस दर्द में भी रावण ने रोया नहीं, चिल्लाया नहीं — बल्कि स्तुति गाई।
वो स्तुति इतनी जोरदार थी कि तीनों लोक कांप उठे। शिवजी प्रसन्न हो गए।
आज उसी स्तुति को पढ़ो — और महसूस करो वो ऊर्जा जो हजारों साल से इन शब्दों में बंद है।शिव तांडव स्तोत्र

शिव तांडव स्तोत्र क्या है
शिव तांडव स्तोत्र लंकाधिपति रावण द्वारा रचित है। रावण एक महाज्ञानी था — वेदों का ज्ञाता, संगीत का मर्मज्ञ, शिव का अनन्य भक्त।
इस स्तोत्र में रावण ने भगवान शिव के तांडव नृत्य का वर्णन किया है। शिव का तांडव सिर्फ नाच नहीं है — वो सृष्टि का निर्माण है, पालन है और संहार है। एक साथ।
इस स्तोत्र में 15 श्लोक हैं। हर श्लोक एक तूफान की तरह है — जो पढ़ते वक्त रोम-रोम में बिजली दौड़ा देता है।शिव तांडव स्तोत्र
॥ शिव तांडव स्तोत्रम् ॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।1।।
जिनकी जटाओं के घने वन से गंगा की धाराएं बह रही हैं और उस पवित्र जल से उनका कंठ प्रक्षालित है, जिनके गले में विशाल सर्पों की माला लटक रही है, जिनके डमरू से डम-डम-डम की भयंकर ध्वनि निकल रही है — वो भगवान शिव प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं। वो हमारा कल्याण करें।
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्जलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम।।2।।
जिनकी जटारूपी कमंडल में आकाश-गंगा तेजी से घूम रही है, जिनके मस्तक पर उसकी लहरें सुशोभित हैं, जिनके ललाट पर धधकती अग्नि जल रही है और मस्तक पर बाल चंद्रमा विराजमान है — उन शिव में मेरा प्रतिक्षण अनुराग बढ़ता जाए।
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि।।3।।
जो पर्वतराज की पुत्री माँ पार्वती के साथ विलासरत हैं, जिनकी उपस्थिति से दिगंत आनंदित है, जिनकी कृपा-दृष्टि से बड़ी से बड़ी विपदाएं दूर हो जाती हैं — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंदित हो।
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि।।4।।
जिनकी जटाओं में लिपटे सर्पों के फनों पर रत्नों की आभा चारों दिशाओं में फैलती है, जिनके शरीर पर मदमस्त हाथी की खाल लिपटी है — उन भूतनाथ में मेरा मन विचित्र आनंद पाए।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियैचिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः।।5।।
जिनके चरणों में इंद्र और समस्त देवताओं के पुष्पों की धूल से धूसरित है, जिनकी जटाओं में सर्पराज की माला बंधी है, जिनके मस्तक पर चंद्रमा है — वो शिव मुझे सदा के लिए श्री-समृद्धि दें।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिंगभा
निपीतपंचसायकं नमन्निलिंपनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसंपदेशिरोजटालमस्तु नः।।6।।
जिनके ललाट की अग्नि से कामदेव भस्म हो गया, जिनके सामने इंद्र भी नतमस्तक हैं, जिनके मस्तक पर चंद्र-किरणें शोभायमान हैं — उन महाकपाली शिव की जटा हमें संपदा दे।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जलद्
धनञ्जयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम।।7।।
जिनके भयंकर ललाट पर दहकती अग्नि ने प्रचंड कामदेव को भस्म कर दिया, जो माँ पार्वती के हृदय में विद्यमान हैं — उन त्रिनेत्र शिव में मेरी भक्ति हो।
नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः।।8।।
जिनका कंठ नए काले मेघों और अमावस के अंधकार जैसा श्याम है, जिन्होंने गंगा को धारण किया है, जिनके पास चंद्रकला है — वो जगत के धुरंधर शिव मुझे श्री-समृद्धि दें।
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे।।9।।
जिनका कंठ खिले नीलकमल जैसी श्यामल आभा से सुशोभित है — मैं उन शिव को भजता हूं जिन्होंने काम को नष्ट किया, त्रिपुर का नाश किया, संसार के बंधन काटे, यज्ञ का अहंकार तोड़ा, गजासुर और अंधकासुर को मारा और यमराज को भी दंड दिया।
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे।।10।।
जो समस्त मंगलकारी कलाओं के मधुर रस का स्वाद लेने वाले हैं — मैं उन शिव को भजता हूं जो काम के अंतक हैं, त्रिपुर के अंतक हैं, संसार के अंतक हैं, यज्ञ के अहंकार के अंतक हैं, गज के अंतक हैं, अंधक के अंतक हैं और यमराज के भी अंतक हैं।
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचंडताण्डवः शिवः।।11।।
जिनके माथे की अग्नि में सर्पों की फुफकार से हवन हो रहा है, जिनके तांडव के साथ मृदंग की धिम-धिम-धिम की मंगलकारी ध्वनि गूंज रही है — वो प्रचंड तांडव करने वाले शिव जयशाली हों।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्।।12।।
पत्थर और सुंदर शय्या में, सर्प और मोतियों की माला में, श्रेष्ठ रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, घास और कमल की आंखों में, प्रजा और महाराजा में — जब मैं समभाव से देखूंगा, तब उन सदाशिव को भजूंगा।
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्।।13।।
कब मैं आकाश-गंगा की कुंज-कंदराओं में निवास करते हुए, बुरी बुद्धि से मुक्त होकर, सिर पर अंजलि उठाए, चंचल नेत्रों से मुक्त होकर, भगवान शिव के तिलक को माथे पर धारण करके — शिव-शिव मंत्र जपते हुए सुखी होऊंगा?
निलिम्पनाथनागरी कदम्बमौलमल्लिका
निगुम्फनिर्भक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परश्रियः परं पदं तदंगजत्विषां चयः।।14।।
देवताओं की नगरी की कदम्ब पुष्पों की माला से टपकते मधुर मकरंद से मनोहर — वो शिव की दिव्य छवि दिन-रात हमारे मन में आनंद भरे और हमें परम पद दे।
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पना।
विमुक्तवाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्।।15।।
प्रचंड बडवानल जैसी प्रभा वाले, आठों सिद्धियों को देने वाले, अष्टसिद्धि देवियों द्वारा पुकारे जाने वाले — शिव मंत्र से विभूषित वो शिव जगत की विजय के लिए प्रकट हों।
॥ फलश्रुति ॥
फलश्रुतिः
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन् स्मरन् ब्रुवन् नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम्।।
जो मनुष्य इस श्रेष्ठ स्तोत्र को नित्य पढ़ता है, स्मरण करता है और सुनाता है — वो सदा पवित्र होता है। भगवान शिव में उसकी दृढ़ भक्ति होती है। शंकर का चिंतन ही देहधारियों के मोह को दूर करता है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः।।
जो व्यक्ति शिवपूजा के अंत में प्रदोष काल में रावण द्वारा रचित इस शिव-स्तुति का पाठ करता है — भगवान शंभु उसे हाथी, घोड़े, रथ से युक्त स्थायी लक्ष्मी और प्रसन्न मुखमंडल प्रदान करते हैं।शिव तांडव स्तोत्र
शिव तांडव स्तोत्र की शक्ति — क्यों इसे पढ़ना चाहिए
ये स्तोत्र एक साधारण प्रार्थना नहीं है। इसकी भाषा, इसकी लय, इसका उच्चारण — सब मिलकर एक ऐसी ऊर्जा बनाते हैं जो सीधे मन की गहराई में उतरती है।
जब रावण ने पहाड़ के नीचे दबे हुए भी ये स्तुति गाई — दर्द में, संकट में, फिर भी भक्ति में — तो भगवान शिव का हृदय पिघल गया। यही इस स्तोत्र का सबसे बड़ा संदेश है।शिव तांडव स्तोत्र
भक्ति परिस्थिति नहीं देखती। भक्ति बस करती है।
कब और कैसे पढ़ें
सोमवार को शिव का दिन है — उस दिन जरूर पढ़ो। प्रदोष काल यानी शाम को पढ़ना सबसे ज्यादा फलदायी है। महाशिवरात्रि पर रात भर इसका जप करने से विशेष कृपा मिलती है। सुबह स्नान के बाद शिवलिंग के सामने बैठकर पढ़ो — ध्यान लगाओ, जल्दी मत करो।
अंत में
रावण ने ये स्तोत्र दर्द में लिखा। पर उस दर्द में भी उसके मन में सिर्फ शिव थे।
हम लोग जब ठीक होते हैं तब भी भगवान को याद नहीं करते। और जब तकलीफ आती है तो रोते हैं।
रावण से सीखो — हर हाल में, हर पल में, हर सांस में — हर हर महादेव।
शिव तुम्हारे हैं। बस पुकारो।
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