लक्ष्मी अष्टकम्

लक्ष्मी अष्टकम् — माँ लक्ष्मी की वो आठ स्तुतियाँ जो घर में धन और सुख की बाढ़ ला देती है

एक सवाल जो हर घर में होता है —

“इतनी मेहनत के बाद भी पैसा क्यों नहीं टिकता? क्यों महीने के अंत में हाथ खाली रहता है? क्यों घर में सुकून नहीं है?”

इसका जवाब हमारे शास्त्रों में बहुत सीधा है —

जब माँ लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं — तो धन आता है, टिकता है और बढ़ता है।
जब माँ लक्ष्मी रुष्ट होती हैं — तो कितना भी कमाओ, हाथ खाली रहता है।

और माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे सुंदर, सबसे सरल और सबसे शक्तिशाली तरीका है —

लक्ष्मी अष्टकम्।

आठ श्लोक। आठ नाम। आठ शक्तियाँ। जब ये आठों श्लोक सच्चे मन से पढ़े जाते हैं — तो माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद घर में उतरता है। धन आता है। सुख आता है। और सबसे बड़ी बात — बरकत आती है।

आज इस पोस्ट में पूरा लक्ष्मी अष्टकम् दे रहे हैं — संस्कृत, हिंदी अर्थ और हर श्लोक की गहराई के साथ।

लक्ष्मी अष्टकम् क्या है — जानो इसकी जड़

लक्ष्मी अष्टकम् एक प्राचीन स्तोत्र है जिसमें माँ लक्ष्मी के आठ दिव्य रूपों की स्तुति है। इसे इन्द्र ने रचा था — जब उनके जीवन से सब वैभव चला गया था।

एक बार महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को शाप दिया — उनके हाथ से लक्ष्मी चली गई। स्वर्ग से वैभव चला गया। देवता कमजोर हो गए। तब इंद्र ने माँ लक्ष्मी की इस अष्टक स्तुति से उन्हें प्रसन्न किया।

ये कथा हमें बताती है — चाहे इंद्र हो या साधारण इंसान — माँ लक्ष्मी की कृपा के बिना कोई भी पूर्ण नहीं है।

॥ लक्ष्मी अष्टकम् ॥

॥ पूर्वभाग — आह्वान ॥

ॐ नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।

हे महामाया! हे सुंदर पीठ पर विराजमान! हे देवताओं द्वारा पूजित! शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

॥ अष्ट श्लोक ॥

नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मि नमस्तेऽस्तु सुरेश्वरि।
नमस्तेऽस्तु जगन्मातः नमस्तेऽस्तु महेश्वरि।।1।।

हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है। हे देवताओं की ईश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। हे जगत् की माता! तुम्हें नमस्कार है। हे महेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है।

माँ लक्ष्मी को यहाँ चार नामों से पुकारा गया है — महालक्ष्मी, सुरेश्वरी, जगन्माता और महेश्वरी। ये चारों नाम उनकी अनंत शक्ति के चार आयाम हैं। जो माँ देवताओं की ईश्वरी हैं, वो हमारे साधारण घर में भी आ सकती हैं — बस बुलाने की जरूरत है।

नमस्तेऽस्तु जगद्धात्रि नमस्तेऽस्तु सुखप्रदे।
नमस्तेऽस्तु वरदे माते नमस्तेऽस्तु सुरार्चिते।।2।।

हे जगत् को धारण करने वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे सुख देने वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे वरदान देने वाली माता! तुम्हें नमस्कार है। हे देवताओं द्वारा पूजित! तुम्हें नमस्कार है।

माँ लक्ष्मी सिर्फ धन नहीं देतीं — वो सुख देती हैं। सुख और धन में फर्क है। धन बिना सुख के खाली है। माँ वरदायिनी हैं — जो माँगो वो देती हैं। लेकिन माँगना सच्चे मन से होना चाहिए।

नमस्तेऽस्तु महाभागे नमस्तेऽस्तु सुमङ्गले।
नमस्तेऽस्तु शुभे देवि नमस्तेऽस्तु हरिप्रिये।।3।।

हे महाभाग्यशाली! तुम्हें नमस्कार है। हे परम मंगलमयी! तुम्हें नमस्कार है। हे शुभ देवी! तुम्हें नमस्कार है। हे हरि की प्रिया! तुम्हें नमस्कार है।

यहाँ माँ को हरिप्रिये कहा गया है — भगवान विष्णु की प्रिया। जब माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु दोनों एक साथ प्रसन्न होते हैं — तो घर में धन और धर्म दोनों आते हैं। सिर्फ पैसा नहीं, सही तरीके का पैसा आता है।

नमस्तेऽस्तु जगद्वन्द्ये नमस्तेऽस्तु सुशोभने।
नमस्तेऽस्तु महादेवि नमस्तेऽस्तु सुरार्चिते।।4।।

हे जगत् द्वारा वंदित! तुम्हें नमस्कार है। हे अत्यंत सुंदर! तुम्हें नमस्कार है। हे महादेवी! तुम्हें नमस्कार है। हे देवताओं द्वारा पूजित! तुम्हें नमस्कार है।

माँ लक्ष्मी सुशोभन हैं — परम सुंदर। उनकी सुंदरता सिर्फ बाहरी नहीं है। जहाँ माँ का वास होता है — वो जगह सुंदर हो जाती है। घर सुंदर होता है, परिवार में प्रेम होता है, जीवन में सौंदर्य आता है।

नमस्तेऽस्तु पद्महस्ते नमस्तेऽस्तु पिनाकिनि।
नमस्तेऽस्तु विशालाक्षि नमस्तेऽस्तु सुरार्चिते।।5।।

हे कमल हाथ में धारण करने वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे पिनाकधारिणी! तुम्हें नमस्कार है। हे विशाल नेत्रों वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे देवपूजित! तुम्हें नमस्कार है।

माँ के हाथ में कमल है — कमल कीचड़ में खिलता है। यही संदेश है कि माँ लक्ष्मी गरीब से गरीब घर में भी आ सकती हैं — बस वो घर पवित्र हो, मेहनत हो और भक्ति हो।

नमस्तेऽस्तु महारौद्रि नमस्तेऽस्तु महाबले।
नमस्तेऽस्तु महाकाली नमस्तेऽस्तु महोदरि।।6।।

हे महारौद्री! तुम्हें नमस्कार है। हे महाबल वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे महाकाली! तुम्हें नमस्कार है। हे महोदरी! तुम्हें नमस्कार है।

ये श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ माँ लक्ष्मी को महाकाली भी कहा गया है। इसका अर्थ है — माँ लक्ष्मी सिर्फ कोमल नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर वो प्रचंड भी हो सकती हैं। जो उनके भक्त को सताए — माँ उसका नाश करती हैं।

नमस्तेऽस्तु सरस्वति नमस्तेऽस्तु सरस्वति।
नमस्तेऽस्तु जगद्धात्रि नमस्तेऽस्तु जगन्मयि।।7।।

हे सरस्वती! तुम्हें नमस्कार है। हे सरस्वती! तुम्हें नमस्कार है। हे जगत् को धारण करने वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे जगन्मयी! तुम्हें नमस्कार है।

यहाँ माँ लक्ष्मी को सरस्वती भी कहा गया है। ये सनातन धर्म की सबसे बड़ी सच्चाई है — धन और ज्ञान अलग नहीं हैं। जहाँ सच्चा ज्ञान है, वहाँ लक्ष्मी भी हैं। जहाँ लक्ष्मी हैं और ज्ञान नहीं — वहाँ लक्ष्मी टिकती नहीं।

नमस्तेऽस्तु महामाये नमस्तेऽस्तु जगत्प्रिये।
नमस्तेऽस्तु सुसंसिद्धे नमस्तेऽस्तु जगन्मये।।8।।

हे महामाया! तुम्हें नमस्कार है। हे जगत् की प्रिया! तुम्हें नमस्कार है। हे सम्पूर्ण सिद्धि वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे जगन्मयी! तुम्हें नमस्कार है।

अंतिम श्लोक में माँ को जगन्मयी कहा गया है — यानी पूरा जगत् माँ से भरा है। जब ये भाव मन में आता है — तो हर जगह माँ दिखती हैं। हर मुस्कान में, हर फूल में, हर सुबह की रोशनी में — माँ लक्ष्मी हैं।

॥ उत्तर भाग — विशेष प्रार्थना ॥

महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।

हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार। हे सुरेश्वरी! तुम्हें नमस्कार। हे हरिप्रिये! तुम्हें नमस्कार। हे दया के सागर! तुम्हें नमस्कार।

पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे।
सर्वभूतहिते देवि नमस्तुभ्यं नमो नमः।।

हे कमल में निवास करने वाली! तुम्हें नमस्कार। हे सब कुछ देने वाली! तुम्हें नमस्कार। हे सभी प्राणियों का भला करने वाली देवी! तुम्हें बारम्बार नमस्कार।

यां देवाः पूजयन्ति श्री महालक्ष्मीं सनातनीम्।
तां पूजयाम्यहं भक्त्या वरदां शुभदां शिवाम्।।

जिन सनातनी महालक्ष्मी की देवता पूजा करते हैं — उन वरदायिनी, शुभदायिनी, कल्याणमयी माँ की मैं भक्तिपूर्वक पूजा करता हूँ।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

हे सर्वमंगलों की मंगला! हे शिवे! हे सभी अर्थों को साधने वाली! हे शरण देने वाली! हे त्र्यम्बके! हे गौरी! हे नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

शरण में आए दीन और आर्त की रक्षा करने में तत्पर, सबकी पीड़ा हरने वाली हे देवी नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।

॥ फलश्रुति ॥

अष्टकं लक्ष्म्याः पठति यो नित्यम्।
धनं धान्यं च तस्य वर्धते।।
पुत्रपौत्रैः समृद्धो भवति।
लक्ष्मीकटाक्षं सदा प्राप्नुयात्।।

जो इस लक्ष्मी अष्टकम् का नित्य पाठ करता है — उसका धन और धान्य बढ़ता है। पुत्र-पौत्रों से समृद्धि आती है। और माँ लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि सदा उस पर रहती है।

शुक्रवारे प्रातःकाले यः पठेत् श्रद्धयान्वितः।
तस्य गृहे वसेल्लक्ष्मीर्नित्यं हि चञ्चला न सा।।

जो शुक्रवार को प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करे — उसके घर में माँ लक्ष्मी नित्य निवास करती हैं। वो चंचला नहीं रहतीं, स्थिर हो जाती हैं।

ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

लक्ष्मी अष्टकम् के आठ रूपों का रहस्य

लक्ष्मी अष्टकम् में माँ के आठ रूपों की झलक मिलती है — और ये आठ रूप ही माँ की अष्टलक्ष्मी हैं।

आदि लक्ष्मी — जो सबसे पहले हैं, अनादि हैं। धन लक्ष्मी — जो धन और वैभव देती हैं। धान्य लक्ष्मी — जो अन्न और भोजन की कमी नहीं होने देतीं। गज लक्ष्मी — जो पशु-धन और शक्ति देती हैं। सन्तान लक्ष्मी — जो संतान का सुख देती हैं। वीर लक्ष्मी — जो साहस और शौर्य देती हैं। विजय लक्ष्मी — जो हर काम में जीत दिलाती हैं। विद्या लक्ष्मी — जो ज्ञान और बुद्धि देती हैं।

जब लक्ष्मी अष्टकम् पढ़ते हो — तो इन आठों रूपों का आशीर्वाद एक साथ मिलता है।

लक्ष्मी अष्टकम् कब और कैसे पढ़ें

शुक्रवार माँ लक्ष्मी का दिन है — उस दिन जरूर पढ़ो। दीपावली पर रात को पूजा के बाद पढ़ो। सुबह स्नान के बाद पूर्व या उत्तर दिशा में मुँह करके बैठो। घी का दीपक जलाओ। कमल या गुलाब का फूल रखो। लाल या पीले आसन पर बैठो।

पढ़ने से पहले मन शांत करो। जल्दी मत करो। हर शब्द को महसूस करो। माँ सुन रही हैं।

अंत में

इंद्र ने जब लक्ष्मी अष्टकम् गाया था — वो एक राजा थे जिनके पास सब कुछ था और फिर भी सब चला गया था। उस दर्द में, उस खालीपन में उन्होंने माँ को पुकारा।

और माँ आई।

हमारी जिंदगी में भी ऐसे पल आते हैं जब सब खाली लगता है। उस वक्त माँ को पुकारो। ये आठ श्लोक पढ़ो। माँ जरूर सुनती हैं — क्योंकि वो जगन्माता हैं। और कोई माँ अपने बच्चे की पुकार अनसुनी नहीं करती।

जय माँ लक्ष्मी। ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।


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