कनकधारा स्तोत्रम् — वो चमत्कार जो आदि शंकराचार्य ने एक गरीब औरत के लिए किया
एक छोटी सी कहानी है —
एक गरीब ब्राह्मणी थी। इतनी गरीब कि घर में खाने को कुछ नहीं था। एक दिन सुबह उसके दरवाजे पर एक बालक आया — भिक्षा माँगने। वो बालक था आदि शंकराचार्य।
ब्राह्मणी के घर में कुछ नहीं था। उसने इधर-उधर खोजा। एक आँवला मिला — बस एक। उसने वही आँवला शंकराचार्य को दे दिया।
शंकराचार्य का दिल भर आया। इस औरत के पास खुद कुछ नहीं है — फिर भी जो था वो दे दिया। ये त्याग, ये भाव — इसका इनाम मिलना चाहिए।
उन्होंने वहीं खड़े होकर माँ लक्ष्मी की स्तुति शुरू की।
और फिर चमत्कार हुआ।
आकाश से सोने के आँवलों की वर्षा हुई। उस गरीब ब्राह्मणी का घर सोने से भर गया।
वो स्तुति थी — कनकधारा स्तोत्रम्।
कनक यानी सोना। धारा यानी धारा — प्रवाह। सोने की धारा बहाने वाला स्तोत्र।
जब भारत के सबसे महान दार्शनिक ने एक गरीब औरत की खातिर माँ लक्ष्मी से सोना माँगा — और माँ ने दिया — तो ये स्तोत्र अमर हो गया।
आज इस पोस्ट में पूरा कनकधारा स्तोत्रम् दे रहे हैं — संस्कृत, हिंदी अर्थ और हर श्लोक की गहराई के साथ।कनकधारा स्तोत्रम्
कनकधारा स्तोत्रम् क्या है — जानो इसकी शक्ति
कनकधारा स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। ये उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।
इस स्तोत्र में 21 श्लोक हैं। हर श्लोक माँ लक्ष्मी के एक दिव्य रूप का वर्णन करता है। भाषा इतनी मधुर है, उपमाएं इतनी सुंदर हैं — कि पढ़ते वक्त लगता है जैसे खुद माँ लक्ष्मी सामने बैठी हैं।
शंकराचार्य ने इसे स्वतःस्फूर्त रचा था — कोई तैयारी नहीं, कोई योजना नहीं। बस एक गरीब औरत का दर्द देखा और माँ के सामने दिल खोल दिया।कनकधारा स्तोत्रम्
यही इस स्तोत्र की असली शक्ति है — ये दिल से निकला था।
॥ कनकधारा स्तोत्रम् ॥
॥ पूर्वभाग — आह्वान ॥
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
वन्देऽहं वरदां लक्ष्मीं सरोजनिलयां हरेः।
पत्नीं पद्मकरां देवीं तां नमामि हरिप्रियाम्।।
मैं वरदायिनी, कमल में निवास करने वाली, भगवान हरि की पत्नी, हाथ में कमल धारण करने वाली, हरिप्रिया देवी लक्ष्मी को प्रणाम करता हूँ।कनकधारा स्तोत्रम्
॥ इक्कीस श्लोक ॥
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती।
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला।
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः।।1।।
जैसे भौंरे की स्त्री कलियों से सुसज्जित तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है — वैसे ही माँ लक्ष्मी भगवान हरि के पुलकित अंगों का आश्रय लेती हैं। समस्त विभूतियों को अपनाने वाली उन मंगलदेवता की कटाक्ष-लीला मुझे मंगल दे।कनकधारा स्तोत्रम्
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः।
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।।
मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या।
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः।।2।।
जो मुग्ध होकर बारम्बार भगवान मुरारि के मुख पर प्रेम और लज्जा से भरी दृष्टि डालती हैं, जिनकी आँखें महाकमल पर भौंरी की तरह विचरण करती हैं — वो समुद्र से जन्मी माँ श्री मुझे लक्ष्मी दें।कनकधारा स्तोत्रम्
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्।
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रा।
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः।।3।।
जो आनंद के मूल मुकुंद के पास पहुँचकर आधी मुंदी आँखों से, कामदेव के वश में होकर, तिरछी दृष्टि से देखती हैं — वो शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान की अंगना मेरी समृद्धि के लिए हों।
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या।
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला।
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः।।4।।
जो भगवान के वक्ष पर कौस्तुभ मणि के पास नीलमणि की माला जैसी शोभायमान हैं — उन कमलालया की कटाक्षमाला जो भगवान की भी कामनाएं पूर्ण करती है — मेरा कल्याण करे।कनकधारा स्तोत्रम्
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः।
धाराधरे स्फुरति या तटिदङ्गनेव।।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिः।
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः।।5।।
जो काले मेघों की माला से सुंदर भगवान कैटभारि के वक्षस्थल पर बिजली की स्त्री की तरह शोभा देती हैं — समस्त जगत की माता, महनीय मूर्ति वाली भृगु-नंदिनी माँ मुझे कल्याण दें।कनकधारा स्तोत्रम्
प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावात्।
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धम्।
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः।।6।।
जिनके प्रभाव से कामदेव ने भी भगवान मधुमर्दन के पास प्रथम स्थान पाया — उन समुद्र-पुत्री की धीमी, मंद, आलसी अर्ध-दृष्टि मुझ पर पड़े।कनकधारा स्तोत्रम्
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्।
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्।
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः।।7।।
जो सम्पूर्ण विश्व और इंद्र को उनके पद का वैभव देने में दक्ष हैं, जो भगवान विष्णु के भी अधिक आनंद का कारण हैं — इंदीवर के समान नेत्रों वाली माँ इंदिरा की अर्ध-दृष्टि क्षणभर मेरे ऊपर पड़े।कनकधारा स्तोत्रम्
इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र।
दृष्ट्या त्रिविष्टपदमीशनिषादसिद्धाः।।
अञ्जः स्तुतादृशमवाप्य किमद्भुतं स्यात्।
इष्टं मनीषितमधीश्वरि माँ कृपाधाः।।8।।
जिनकी दयाद्र दृष्टि से श्रेष्ठ मुनियों ने भी स्वर्ग-पद पाया — तो मुझ साधारण की स्तुति सुनकर यदि वो कृपा करें तो क्या आश्चर्य? हे अधीश्वरी माँ! मेरी मनोकामना पूरी करो।
त्रैलोक्यभूषणमिदं विजयी विधात्री।
पद्मालयां प्रतिभयापहरां सुकान्ताम्।।
विश्वम्भरामभिनवां जगतां जनित्रीम्।
इन्दिरामिन्दुवदनां सदनुस्मरामि।।9।।
तीनों लोकों की भूषण, विजय देने वाली, कमल में निवास करने वाली, भय दूर करने वाली, सुंदर, विश्व को धारण करने वाली, नवीन, जगत् की जननी, चंद्रमुखी माँ इंदिरा का मैं सदा स्मरण करता हूँ।
कन्दर्पकोटिकमनीयतरं स्वरूपं।
विष्णोरमुष्य भवती भजते भगिन्याः।।
ताभ्यः सुमोहनमतीव मनोज्ञमेतत्।
दृष्ट्यात्मनो नयनपारणमाविरस्तु।।10।।
करोड़ों कामदेवों से भी सुंदर भगवान विष्णु के जो रूप हैं — माँ लक्ष्मी उसे अपनी बहन के रूप में भजती हैं। वो अत्यंत मनमोहक रूप मेरी आँखों का उत्सव बने।
विष्णुप्रियाविमलपत्रविशालदृष्टि।
वैदेहिरेव विलसत्यनिशं हृदि मे।।
सत्येन मे त्वदनुभावमहाप्रभावा।
भक्तिः प्रसीदतु सदा मम मङ्गलाय।।11।।
विष्णुप्रिया की निर्मल, बड़े पत्तों जैसी विशाल दृष्टि — वैदेही (सीता) जैसी — मेरे हृदय में सदा विलसित हो। माँ की महाप्रभावशाली भक्ति मेरे कल्याण के लिए सदा प्रसन्न हो।
श्रियः कान्ताय कल्याणनिधये निधयेऽर्थिनाम्।
श्रिये सर्वजगतां नाथाय श्रीपतये नमः।।12।।
माँ श्री के प्रिय, कल्याण के भंडार, याचकों के लिए निधि, सम्पूर्ण जगत् के नाथ, श्रीपति भगवान को नमस्कार है।
कमलाकुचचूचुककुंकुमतो।
नियलीयमाननलिनाङ्गनया।।
कमलेन कलमलपालिनया।
कमला विजयते परमा।।13।।
जिनके वक्षस्थल पर कुमकुम की लाली है, जो कमल-अंगनाओं से घिरी हैं, जो अपने कमल से पापों का पालन करती हैं — वो परम माँ कमला सर्वत्र विजयशाली हों।
तव विलासिनि कोमलकान्तिभिः।
शिशिरमेघलसन्मृदुलश्रिया।।
तदनुभावविशेषवशीकृतो।
मृदुरयं मदनेन विनिर्मितः।।14।।
हे विलासिनी माँ! तुम्हारी कोमल कांति शीतल मेघों जैसी मृदुल श्री से युक्त है। उस अनुभव की विशेष शक्ति से मोहित होकर ये कोमल शरीर कामदेव ने बनाया है।
नरभवे निहितं किल यत्फलं।
त्वदभिषेकजलैरिह तर्पितम्।।
भुवनमातरिदं भवती पुनः।
पुरुषरत्नविशेषजनिष्यति।।15।।
हे भुवनमाता! जो फल मनुष्य जन्म में निहित है — तुम्हारे अभिषेक-जल से तृप्त होकर वो इस संसार में विशेष पुरुषरत्न को जन्म देगा।
नलिनपत्रसुपिच्छिलगेहिनि।
प्रणतरक्षणदक्षिणदायिनि।।
नलिनदेशिककेलिकमालिनि।
निहितभक्तहितेषु मनो दध।।16।।
हे कमल-पत्र की तरह सुकोमल निवास वाली! हे शरणागत की रक्षा में दक्षिणा देने वाली! हे कमल-पराग से खेलने वाली! हे भक्तों के हित में मन लगाने वाली! मेरी सुनो।
सकलविश्वजनीनसुखाय या।
करुणयैव हि कुर्वति सन्ततम्।।
तदनुकम्पनया मम सन्ततम्।
कुरु कृपां भगवन्ति कृपालये।।17।।
जो करुणा से ही सम्पूर्ण विश्व के लोगों को सुख देती रहती हैं — हे करुणा के निवास, हे भगवती! उसी अनुकम्पा से मुझ पर सदा कृपा करो।
तव चतुर्दशलोकनिवासिनां।
अखिलपापहरं यदनुस्मरणम्।।
मम तदेव सदा हृदि भासतां।
भवतु मे शुभदा भगवत्यलम्।।18।।
चौदह लोकों के निवासियों के समस्त पापों को हरने वाला तुम्हारा स्मरण — वो सदा मेरे हृदय में प्रकाशित हो। हे भगवती! तुम मुझे पर्याप्त शुभ दो।
स्तुतिमिमां परिशीलितवान् जनो।
जयति यः श्रुतिमात्रसुखावहाम्।।
कमलया परिपालित एव सः।
कमलयेव स विभाति परिष्कृतः।।19।।
जो मनुष्य इस स्तुति को जो सुनने मात्र से सुख देती है — उसका अभ्यास करता है, वो माँ कमला द्वारा पालित होता है। वो कमल की तरह शुद्ध और शोभित होता है।
पठनपावनमेव पवित्रतरं।
श्रवणपावनमेतदशेषतः।।
इति मतिः स्थिरतां मम यातु का।
वसतु मानसमे कमलासनया।।20।।
पाठ से पवित्र, श्रवण से सर्वथा पवित्र करने वाला ये स्तोत्र — ऐसा विश्वास मेरे मन में स्थिर हो। कमल पर आसीन माँ मेरे मन में निवास करें।
श्रुतिशिरःसु विराजितपादुकां।
हृदयपद्मनिवासिनिमव्ययाम्।।
भगवतीं परमामपराजितां।
स्मरति यो नियतं स जयेन्नृणाम्।।21।।
वेदों के शिखर पर विराजित पादुका वाली, हृदय-कमल में निवास करने वाली, अव्यय, परम भगवती, अपराजित माँ का जो नियमित स्मरण करता है — वो मनुष्यों में विजयी होता है।
॥ उत्तर भाग — विशेष प्रार्थना ॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।
हे माँ! मुझे सौभाग्य दो, आरोग्य दो, परम सुख दो। रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे।
राज्यं देहि कीर्तिं देहि विद्यां देहि सुरार्चिते।।
हे देवताओं द्वारा पूजित माँ! पुत्र दो, धन दो, सभी मनोकामनाएं दो। राज्य दो, कीर्ति दो और विद्या दो।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनमार्यो धनं हरिः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमस्तु मे।।
अग्नि मेरा धन हो, वायु मेरा धन हो, आर्य मेरा धन हो, हरि मेरा धन हो। इंद्र, बृहस्पति और वरुण — सभी मेरा धन हों।
॥ फलश्रुति ॥
इति शंकरभगवत्पाद विरचितं।
कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम्।।यः पठेत् कनकधारां नित्यं भक्तिसमन्वितः।
तस्य गृहे वसेल्लक्ष्मीः स्थिरा नित्या सनातनी।।
जो भक्तिपूर्वक नित्य कनकधारा का पाठ करे — उसके घर में माँ लक्ष्मी स्थिर, नित्य और सनातन रूप से निवास करती हैं।
दारिद्र्यदुःखभयशोकविनाशनाय।
आयुर्विवृद्धिकरणाय सुखाय नित्यम्।।
श्रेयः प्रदाय च समस्तजनस्य देव्यै।
नमस्तु कनकधारया विभवाय।।
दरिद्रता, दुःख, भय और शोक के नाश के लिए, आयु की वृद्धि के लिए, नित्य सुख के लिए, श्रेय देने वाली उन देवी को — कनकधारा के वैभव के साथ नमस्कार।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
कनकधारा स्तोत्रम् का चमत्कार — शंकराचार्य ने क्यों लिखा
शंकराचार्य उस दिन भिक्षा माँगने निकले थे — गुरुकुल में पढ़ने वाले ब्रह्मचारी थे। उन दिनों गुरुकुल के छात्र भिक्षा माँगकर जीवन चलाते थे।
जब उस गरीब ब्राह्मणी ने एक आँवला दिया — तो शंकराचार्य के मन में एक विचार आया। इस स्त्री ने जो दिया वो उसके पास था उसका सब कुछ था। ये त्याग अनुत्तरित नहीं रहना चाहिए।
और तब उन्होंने माँ लक्ष्मी से सीधे माँगा — इस औरत के लिए।
यही कनकधारा का सबसे बड़ा संदेश है — जो दूसरों के लिए माँगते हैं, माँ उनकी भी सुनती हैं।
कनकधारा स्तोत्रम् कब और कैसे पढ़ें
शुक्रवार को माँ लक्ष्मी का दिन है। उस दिन सुबह स्नान के बाद पीले या लाल आसन पर बैठकर पढ़ो। घी का दीपक जलाओ। पीले फूल चढ़ाओ।
दीपावली की रात को कनकधारा का पाठ विशेष फलदायी है। जब घर में आर्थिक संकट हो, जब धन नहीं टिक रहा हो, जब बरकत नहीं हो रही हो — तब 21 दिन तक नित्य पाठ करो।
अंत में
शंकराचार्य ने एक बात कर दी जो हम सब भूल जाते हैं —
उन्होंने खुद के लिए नहीं माँगा। दूसरे के लिए माँगा।
और माँ ने तुरंत दिया। सोने की बरसात कर दी।
हमारी जिंदगी में भी जब हम सिर्फ खुद के लिए माँगते हैं — तो माँ सुनती तो हैं लेकिन देर हो जाती है। लेकिन जब किसी और की खुशी के लिए माँगो — तो माँ की कृपा तुरंत बरसती है।
ये है कनकधारा का असली रहस्य।
जय माँ लक्ष्मी। ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।
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