महालक्ष्मी अष्टकम्

महालक्ष्मी अष्टकम् — इंद्र की वो आठ स्तुतियाँ जिनसे माँ लक्ष्मी तुरंत प्रसन्न होती हैं

एक पल के लिए सोचो —

तुम्हारे पास सब कुछ है। धन है, पद है, शक्ति है। और फिर एक दिन अचानक सब चला जाता है। घर खाली हो जाता है। हाथ खाली हो जाते हैं। लोग साथ छोड़ देते हैं।

उस वक्त क्या करोगे?

यही हुआ था देवराज इंद्र के साथ।

महर्षि दुर्वासा के शाप से माँ लक्ष्मी स्वर्ग छोड़ गईं। देवता कमजोर हो गए। असुरों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। इंद्र के पास सब था — और एक पल में सब खत्म हो गया।

तब इंद्र ने माँ महालक्ष्मी की स्तुति की। आठ श्लोकों में। इतनी श्रद्धा से, इतनी गहराई से — कि माँ का दिल पिघल गया। और माँ वापस आईं।

वो स्तुति है — महालक्ष्मी अष्टकम्।

ये वही स्तोत्र है जो पद्म पुराण में है। इंद्र द्वारा रचित। आठ श्लोक। आठ नाम। आठ वरदान।

और सबसे खास बात — इस स्तोत्र के अंत में माँ खुद कहती हैं — “जो इसे पढ़ेगा, उसके घर से मैं कभी नहीं जाऊंगी।”

आज इस पोस्ट में पूरा महालक्ष्मी अष्टकम् दे रहे हैं — संस्कृत, हिंदी अर्थ और हर श्लोक की गहराई के साथ।

महालक्ष्मी अष्टकम् क्या है — जानो इसका महत्व

महालक्ष्मी अष्टकम् पद्म पुराण से लिया गया है। इसे इंद्र ने तब रचा जब उनके जीवन से सारा वैभव चला गया था।

इस स्तोत्र में माँ महालक्ष्मी के आठ दिव्य रूपों की स्तुति है — हर श्लोक में माँ का एक अलग स्वरूप, एक अलग शक्ति।

ये स्तोत्र लक्ष्मी अष्टकम् से अलग है। लक्ष्मी अष्टकम् में माँ की विनम्र स्तुति है। महालक्ष्मी अष्टकम् में माँ की महाशक्ति का वर्णन है — उनके प्रचंड रूप का, उनकी असीम शक्ति का, उनके विराट स्वरूप का।

माँ सिर्फ धन की देवी नहीं हैं। माँ महालक्ष्मी हैं — महाशक्ति की अधिष्ठात्री। जब उनकी ये महाशक्ति जागती है — तो सब कुछ बदल जाता है।

महालक्ष्मी अष्टकम्
महालक्ष्मी अष्टकम्

॥ महालक्ष्मी अष्टकम् ॥

॥ पूर्वभाग — विनियोग ॥

ॐ अस्य श्रीमहालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रस्य।
इन्द्र ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः।
श्री महालक्ष्मीर्देवता।
महालक्ष्मीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।।

॥ ध्यानम् ॥

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी।
गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता।।

जो पद्मासन पर विराजमान हैं, जिनके कूल्हे विशाल हैं, जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी लंबी हैं, जिनकी गहरी नाभि है, जो स्तनभार से थोड़ी झुकी हैं, जो श्वेत वस्त्र से सुशोभित हैं, जिन्हें दिव्य हाथियों ने मणिजड़ित सोने के घड़ों से स्नान कराया है, जिनके हाथों में सदा कमल है और जो सर्वमंगल से युक्त हैं — वो माँ लक्ष्मी मेरे घर में निवास करें।

॥ अष्ट श्लोक ॥

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।1।।

हे महामाया! हे श्रेष्ठ पीठ पर विराजमान! हे देवताओं द्वारा पूजित! हे शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

पहले श्लोक में ही माँ का विराट स्वरूप सामने आता है। माँ के हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं — ये भगवान विष्णु के आयुध हैं। इसका अर्थ है माँ महालक्ष्मी सिर्फ कोमल नहीं हैं — वो महाशक्ति भी हैं। भक्तों की रक्षा के लिए वो हथियार भी उठाती हैं।

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।2।।

हे गरुड़ पर सवार! हे कोलासुर को भयभीत करने वाली! हे सभी पापों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

यहाँ माँ गरुडारूढ़ हैं — गरुड़ पर सवार। ये भगवान विष्णु का वाहन है। और माँ ने कोलासुर का वध किया था। माँ लक्ष्मी सिर्फ धन देने वाली नहीं हैं — वो असुरों का संहार भी करती हैं। जो भक्त की राह में रुकावट हो — माँ उसे हटाती हैं।

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।3।।

हे सर्वज्ञ! हे सभी को वरदान देने वाली! हे सभी दुष्टों को भयभीत करने वाली! हे सभी दुःखों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

माँ सर्वज्ञ हैं — सब कुछ जानती हैं। तुम्हारा दुःख, तुम्हारी तकलीफ, तुम्हारी जरूरत — सब। इसलिए माँ को बताने की जरूरत नहीं। बस माँगने की जरूरत है। और माँ सर्वदुःखहरे हैं — सब दुःख हरने वाली।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भक्तिमुक्तिप्रदायिनि।
मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।4।।

हे सिद्धि और बुद्धि देने वाली देवी! हे भक्ति और मुक्ति देने वाली! हे मंत्रमूर्ति! हे सदा विराजमान देवी महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

ये श्लोक सबसे महत्वपूर्ण है। माँ यहाँ चार वरदान देती हैं — सिद्धि, बुद्धि, भक्ति और मुक्ति। सिर्फ पैसा नहीं। ज्ञान भी। सिर्फ सांसारिक सुख नहीं। मोक्ष भी। जो माँ से सच्चे मन से माँगता है — उसे सब कुछ मिलता है।

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।5।।

हे आदि और अंत से रहित देवी! हे आदिशक्ति महेश्वरी! हे योग से जन्मी! हे योग से उत्पन्न! हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

माँ आद्यन्तरहित हैं — न आदि है, न अंत। वो अनंत हैं। वो आदिशक्ति हैं — सबसे पहली शक्ति। इस सृष्टि में जो भी शक्ति है — वो माँ से है। माँ की शक्ति को पाने वाला कभी कमजोर नहीं हो सकता।

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।6।।

हे स्थूल और सूक्ष्म रूप वाली! हे महारौद्री! हे महाशक्ति! हे महोदरी! हे महापापों को हरने वाली देवी महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

यहाँ माँ का महारौद्र रूप है — प्रचंड, भयंकर। माँ महापापहरे हैं — बड़े से बड़े पाप को भी हरने वाली। जो इंसान सोचता है कि उसने बहुत पाप किए हैं और माँ उसे माफ नहीं करेंगी — वो गलत है। माँ की करुणा अनंत है।

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।7।।

हे पद्मासन पर विराजमान देवी! हे परब्रह्म स्वरूपिणी! हे परमेश्वरी! हे जगन्माता! हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

माँ परब्रह्मस्वरूपिणी हैं — परब्रह्म का ही स्वरूप। इसका अर्थ है माँ लक्ष्मी सिर्फ एक देवी नहीं हैं। वो स्वयं ब्रह्म हैं — सर्वोच्च सत्ता। और वो जगन्माता हैं — पूरे जगत् की माँ। तो हम उनके बच्चे हैं। और कोई माँ अपने बच्चे को दुखी नहीं देख सकती।

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातः महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते।।8।।

हे श्वेत वस्त्र धारण करने वाली देवी! हे अनेक आभूषणों से सुशोभित! हे जगत् में स्थित! हे जगन्माता! हे महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है।

अंतिम श्लोक में माँ का सबसे सुंदर रूप है — श्वेत वस्त्र धारण किए, सोने के आभूषणों से सजी, पूरे जगत् में व्याप्त। माँ जगत्स्थिते हैं — जगत् में ही स्थित हैं। यानी माँ कहीं दूर नहीं हैं। इसी दुनिया में हैं। हर जगह हैं। बस देखने वाली आँख चाहिए।

॥ माँ लक्ष्मी का वरदान — फलश्रुति ॥

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान् नरः।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा।।

जो भक्तिमान मनुष्य इस महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ करे — वो सभी सिद्धियाँ पाता है और सदा राज्य-वैभव प्राप्त करता है।

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः।।

जो नित्य एक बार पाठ करे — उसके महापाप नष्ट होते हैं। जो नित्य दो बार पाठ करे — वो धन और धान्य से युक्त होता है।

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेत् तस्य प्रसन्ना वरदा ध्रुवम्।।

जो नित्य तीन बार पाठ करे — उसके महाशत्रु नष्ट होते हैं। माँ महालक्ष्मी निश्चित रूप से प्रसन्न होकर वरदान देती हैं।

यस्य गृहे पठ्यते नित्यं महालक्ष्म्यष्टकं शुभम्।
तस्य गृहे न दारिद्र्यं लक्ष्मीर्नित्यं स्थिरा भवेत्।।

जिसके घर में यह शुभ महालक्ष्मी अष्टकम् नित्य पढ़ा जाता है — उसके घर में दरिद्रता नहीं रहती और माँ लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करती हैं।

देव्युवाच —
यो मामष्टकमेतेन स्तौति भक्त्या दिने दिने।
तस्याहं सर्वकार्याणि साधयामि न संशयः।।

माँ बोलीं — जो मनुष्य इस अष्टकम् से प्रतिदिन मेरी भक्तिपूर्वक स्तुति करता है — मैं उसके सभी कार्य सिद्ध करती हूँ। इसमें कोई संशय नहीं।

तस्य गृहे निवत्स्यामि नित्यं वित्तप्रदायिनी।
नास्ति मे सन्देहः क्वचित् भक्तः प्रियो मम।।

मैं उसके घर में नित्य धन देते हुए निवास करूंगी। मुझे कोई संदेह नहीं — भक्त मुझे प्रिय हैं।

॥ उत्तर भाग — विशेष प्रार्थना ॥

ॐ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

हे सर्वमंगलों की मंगला! हे शिवे! हे सभी अर्थों को साधने वाली! हे शरण देने वाली त्र्यम्बके! हे गौरी! हे नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

शरण में आए दीन और पीड़ित की रक्षा करने में सदा तत्पर, सबकी पीड़ा हरने वाली हे देवी नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।

हे सर्वस्वरूपे! हे सर्वेशे! हे सभी शक्तियों से युक्त! हे देवी! सब भयों से हमारी रक्षा करो। हे दुर्गा देवी! तुम्हें नमस्कार है।

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा।
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां।
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

तुम प्रसन्न हो तो सभी रोग नष्ट करती हो। रुष्ट हो तो सभी अभीष्ट कामनाएं नष्ट कर देती हो। जो तुम्हारी शरण में हैं उन पर विपत्ति नहीं आती। तुम्हारी शरण में आने वाले सदा शरणदाता को पाते हैं।

सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।।

हे अखिलेश्वरी! तीनों लोकों की सभी बाधाओं का शमन करो। इसी तरह हमारे शत्रुओं का भी नाश करो।

ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

महालक्ष्मी अष्टकम् और लक्ष्मी अष्टकम् में फर्क

बहुत लोग पूछते हैं — दोनों अष्टकम् में क्या फर्क है?

लक्ष्मी अष्टकम् में माँ का कोमल, वात्सल्यमयी रूप है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को दुलारती है। उसमें माँ से धन, सुख और आशीर्वाद माँगा गया है।

महालक्ष्मी अष्टकम् में माँ का महाशक्ति, महारौद्री रूप है। इसमें माँ के उस स्वरूप की स्तुति है जो असुरों को भय देता है, जो परब्रह्म स्वरूप है, जो आदिशक्ति है।

सरल भाषा में कहें तो लक्ष्मी अष्टकम् माँगने का स्तोत्र है और महालक्ष्मी अष्टकम् माँ की महाशक्ति को जगाने का स्तोत्र है।

दोनों का एक साथ पाठ करने से दोगुना फल मिलता है।

एक बार, दो बार या तीन बार — कब क्या फायदा

फलश्रुति में माँ खुद बताती हैं कि कितनी बार पाठ करने से क्या मिलता है।

एक बार नित्य पाठ करने से महापाप नष्ट होते हैं और जीवन शुद्ध होता है। दो बार नित्य पाठ करने से धन और अन्न की कमी नहीं रहती, घर में बरकत आती है। तीन बार नित्य पाठ करने से शत्रुओं का नाश होता है और माँ स्वयं प्रसन्न होकर वरदान देती हैं।

और जिसके घर में नित्य ये पाठ होता है — माँ खुद कहती हैं — “मैं उस घर में रहूंगी।”

महालक्ष्मी अष्टकम् कब और कैसे पढ़ें

शुक्रवार को सुबह और शाम दोनों समय पढ़ो। दीपावली, शरद पूर्णिमा और एकादशी को विशेष रूप से पढ़ो। सुबह स्नान के बाद लाल या पीले आसन पर बैठो। घी का दीपक जलाओ। लाल या पीले फूल माँ को अर्पित करो। केसर मिला हुआ जल छिड़को।

पाठ करते वक्त मन में माँ का ध्यान रखो। उनकी दिव्य मूर्ति को मन में देखो — श्वेत वस्त्र, सोने के आभूषण, हाथ में कमल, चेहरे पर मुस्कान।

अंत में

इंद्र राजा थे। देवताओं के स्वामी। लेकिन माँ के बिना सब खाली था।

हम साधारण इंसान हैं। हमारे पास तो और भी कम है। लेकिन माँ महालक्ष्मी के लिए हम साधारण नहीं हैं।

हम उनके बच्चे हैं।

और माँ ने खुद कहा है — “भक्त मुझे प्रिय हैं। मैं उनके सभी कार्य सिद्ध करती हूँ।”

बस एक काम करो — रोज सुबह उठो, माँ को याद करो, ये आठ श्लोक पढ़ो। माँ का वादा है — वो तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएंगी।

जय माँ महालक्ष्मी।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।


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