हनुमान बाहुक — तुलसीदास का वो दर्द भरा स्तोत्र जो हर पीड़ा, रोग और संकट को जड़ से मिटा देता है
जिंदगी में कभी ऐसा वक्त आता है —
दर्द इतना होता है कि उठना मुश्किल हो जाता है। शरीर जवाब दे देता है। दवाइयाँ काम नहीं करतीं। डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं। और लगता है — अब कोई रास्ता नहीं।
उस वक्त क्या करें?
यही हुआ था गोस्वामी तुलसीदास के साथ।
रामचरितमानस लिखने वाले, हनुमान चालीसा देने वाले — वो महाकवि। वृद्धावस्था में उन्हें भयंकर बाहु-रोग हुआ। दोनों भुजाएं असहनीय दर्द से तड़प रही थीं। लिखना बंद। चलना बंद। सब बंद।
उस दर्द में तुलसीदास ने क्या किया?
रोए नहीं। टूटे नहीं।
अपने प्रिय हनुमानजी को पुकारा। उस पुकार को शब्द दिए। उन शब्दों से जन्म लिया —
हनुमान बाहुक।
और हनुमानजी ने सुना। बाहु-रोग दूर हुआ।
ये स्तोत्र आज भी उतना ही शक्तिशाली है। जो भी शारीरिक, मानसिक, या सांसारिक पीड़ा में है — ये पाठ उसके लिए है।हनुमान बाहुक
हनुमान बाहुक क्या है — जानो इसकी पृष्ठभूमि
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना है। इसमें 44 छंद हैं — छप्पय, झूलना, घनाक्षरी और सवैया में।
बाहुक का अर्थ है भुजाओं की पीड़ा। तुलसीदास जी ने अपने असहनीय दर्द को भक्ति में बदल दिया। इसमें एक तरफ हनुमानजी की अपार महिमा है — दूसरी तरफ एक सच्चे भक्त का दर्द, उसकी विनती, उसकी करुण पुकार।
यह कोई साधारण स्तोत्र नहीं — यह एक भक्त की आत्मा की पुकार है।
॥ श्री हनुमान बाहुक ॥
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास कृत
॥ छप्पय — १ ॥
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव॥
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट॥१॥
समुद्र पार करने वाले, माँ सीता का शोक हरने वाले, उगते सूर्य जैसे तेजस्वी शरीर वाले, विशाल भुजाओं वाले, भयंकर मूर्ति वाले — जो काल के भी काल हैं। निःसंक होकर लंका जलाने वाले, राक्षसों के बल और अहंकार को नष्ट करने वाले पवनपुत्र। तुलसीदास कहते हैं — जो इनका गुण गाए, नमन करे, स्मरण करे, जप करे — उसके सब संकट दूर होते हैं।हनुमान बाहुक
॥ छप्पय — २ ॥
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज बज्र-तन॥
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन।
कपिस केस, करकस लंगूर, खल-दल बल भानन॥
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुं नहिं आवत निकट॥२॥
सोने के पर्वत जैसे, करोड़ों उगते सूर्यों जैसे तेजस्वी, विशाल छाती, प्रचंड भुजाएं, वज्र जैसे नख, वज्र जैसा शरीर। पिंगल नेत्र, भयंकर भृकुटी, कपिश केश — दुष्टों के बल को नष्ट करने वाले। जिसके हृदय में हनुमानजी की ये विकट मूर्ति बसती है — उसके पास संताप और पाप सपने में भी नहीं आते।हनुमान बाहुक
॥ झूलना — ३ ॥
पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर,
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो।
बकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली,
बेद बंदी बदत पैजपूरो॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल,
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,
पवन को पूत रजपूत रुरो॥३॥
पंचमुख शिव, षण्मुख कार्तिकेय, भृगु जैसे श्रेष्ठ योद्धा — देव और असुर सब जिनके सामने नतमस्तक हैं। वेद भी जिनका यश गाते हैं, जिनकी गुणगाथा स्वयं रघुनाथ कहते हैं — शत्रु-दल का नाश करने वाले श्रेष्ठ पवनपुत्र।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ४ ॥
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-
अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,
क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै,
तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो॥४॥
सूर्य से पढ़ने जाते बालक हनुमान ने बाल-क्रीड़ा करते हुए उल्टे पैरों आकाश में विचरण किया। इंद्र, हरि, हर और ब्रह्मा देखते रह गए — आँखें चौंधिया गईं। तुलसीदास कहते हैं — उनके शरीर में बल, वीरता, धैर्य और साहस सबका सार है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ५ ॥
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज,
गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो।
कल्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर,
बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि,
फलंग फलांग हते घाटि नभतल भो।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,
हनुमान देखे जगजीवन को फल भो॥५॥
महाभारत में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान कपिराज की गर्जना सुनकर कुरु-सेना भयभीत हो गई। द्रोण और भीष्म भी जिनके बल-सागर में केवल जल थे — उन महाबीर को देखकर योद्धाओं ने सिर झुकाए, हाथ जोड़े।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ६ ॥
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक,
निपट निसंक परपुर गलबल भो।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,
कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो॥
संकट समाज असमंजस भो रामराज,
काज जुग पूगनि को करतल पल भो।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बांह,
लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो॥६॥
समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे जैसा करके लंका में होली जैसी आग लगाई। द्रोणाचल पर्वत को खेल में उखाड़ लिया — गेंद जैसा। राम के राज के संकट में जिनकी भुजाओं ने युगों के काम पल में कर दिए।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ७ ॥
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड मानो,
नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो,
महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो॥
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईधन को,
तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान,
सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो॥७॥
कछुए की पीठ जिनके पैरों की ठोकर से भर गई। कुम्भकर्ण और रावण जिनके प्रताप की अग्नि में जले। भीष्म कहते हैं — तीनों कालों और तीनों लोकों में हनुमान जैसा महाबली नहीं हुआ।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ८ ॥
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको,
तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन,
सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो,
प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान,
साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो॥८॥
राम के दूत, पवन के सुपुत्र, अंजनी के नंदन — सूर्य जैसे तेजस्वी। सीता का शोक हरने वाले, दोषों को नष्ट करने वाले। रावण जैसे दुःसह दरिद्र को हरने वाले तुलसी के निधान — ऐसे ज्ञानवान, गुणवान, बलवान हनुमान को हृदय में धारण करो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ९ ॥
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल,
बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु,
सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को॥
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक,
तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास,
नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को॥९॥
शत्रु-दल को नष्ट करने वाले, वेदों में जिनका यश है, देवताओं के बंधन छुड़ाने वाले। पाप, ताप और अंधकार को हरने में कुशल। लोक-परलोक में शोक नहीं — तुलसी के हृदय में केसरीकिशोर का एक ही भरोसा है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — १० ॥
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत,
महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन,
करुना-कलित मन धारमिक धीर को॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को,
सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को,
सेवक सहायक है साहसी समीर को॥१०॥
महाबल की सीमा, रघुवीर के परम प्रिय। वज्र जैसे कठोर शरीर — फिर भी मन में करुणा। दुर्जनों के लिए काल जैसे कराल, सज्जनों के पालक। स्मरण करने से तुलसीदास की पीड़ा हरने वाले — सेवकों के सहायक पवनपुत्र।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ११ ॥
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि,
हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को,
सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो॥
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो।
आरत की आरति निवारिबे को तिहूं पुर,
तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो॥११॥
रचने को ब्रह्मा, पालने को हरि, मारने को हर — जीवन देने में अमृत जैसे हैं हनुमान। धारण में धरती, अंधकार नष्ट करने में सूर्य, दुष्टों को दंड देने और भक्तों को सुख देने वाले — तीनों लोकों की पीड़ा हरने वाले तुलसी के हठीले साहेब।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — १२ ॥
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,
सानुकरूल सूलपानि नवै नाथ नांक को।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोर हाथ,
बापुरे बराक कहा और राजा रांक को॥
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,
ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आंक को।
सब दिन रुरो पर पूरो जहां-तहां ताहि,
जाके है भरोसो हिये हनुमान हांक को॥१२॥
सेवक की भावना जानकर श्रीराम मानते हैं, शिवजी नमन करते हैं। देवी, देव, दानव सब हाथ जोड़ते हैं। जागते, सोते, उठते-बैठते जिसके हृदय में हनुमान की हाँक का भरोसा है — उसका हर दिन अच्छा, हर जगह पूरा।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — १३ ॥
सानुग सगौरि सानुकरूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि,
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी॥
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,
जाके हिये हुलसति हांक हनुमान की॥१३॥
गौरी सहित शिव, सभी लोकपाल, लक्ष्मण, राम, जानकी — सब उसके साथ हैं। तीनों लोकों में निश्चिंत रहता है वो — जिसके हृदय में हनुमान की हाँक हुलसती है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — १४ ॥
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-
महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही,
नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील,
लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ।
मन की बचन की करम की तिहूं प्रकार,
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ॥१४॥
करुणा के भंडार, बल-बुद्धि के भंडार, महिमा के भंडार, गुण-ज्ञान के भंडार। शिवरूप, राम के स्नेही — नाम लेने से अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष देने वाले। मन, वचन, कर्म तीनों से तुलसीदास तुम्हारे हैं — तुम सुजान साहेब हो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — १५ ॥
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस,
काज महाराज के समाज साज साजे हैं।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर,
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर,
सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं।
बिगरी संवार अंजनी कुमार कीजे मोहि,
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं॥१५॥
मन को अगम्य, शरीर को सुगम बनाने वाले कपीश। देवताओं को बंधनमुक्त करने वाले केसरीकिशोर। हे अंजनी के कुमार! मेरी बिगड़ी बनाओ — जैसे हनुमान के कृपापात्रों की होती आई है।हनुमान बाहुक
॥ सवैया — १६ ॥
जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहार।
कारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहार॥
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो।
दोष सुनाये ते आगेहूं को होशियार हैं हों मन तौ हिय हारो॥१६॥
हे हनुमान! तुम ज्ञान के शिरोमणि हो, सदा भक्तों के मन में बसते हो। मैंने जो बिगाड़ा — किसको क्या कहूं। साहेब-सेवक के नाते जो हुआ — तुलसी का कोई चारा नहीं। दोष सुनाए ताकि आगे सावधान रहो — मन से हार गया हूँ।हनुमान बाहुक
॥ सवैया — १७ ॥
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फट मकरी के से जाले।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले॥१७॥
जिसे तुम स्थापित करो — महेश भी नहीं उखाड़ सकते। तुम्हारे नाम की फुँक से तुलसी के सब संकट मकड़ी के जाले जैसे उड़ जाते हैं। बूढ़े हो गए — अब तो मेरी बारी है।हनुमान बाहुक
॥ सवैया — १८ ॥
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुजर छैल छवा से॥
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से।
बानर बाज! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से॥१८॥
समुद्र पार किया, बड़े-बड़े वीरों को दला, लंका जलाई। तुम जैसे समर्थ साहेब की सेवा में रहकर तुलसी दुख-दोष को दवा जैसे सहते हैं। हे बाज जैसे बानर! बढ़े हुए दुष्टों को लपेट कर क्यों नहीं लेते?हनुमान बाहुक
॥ सवैया — १९ ॥
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो।
बारिदनाद अकंपन कुभकरन्न-से कुजर केहरि-बारो॥
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूं-तें सदा तुलसी कहूं सो रखवारो॥१९॥
अक्षकुमार को मारने वाले, वन में सूर्य जैसे — रावण भी आमने-सामने न आ सका। राम के प्रताप की अग्नि — पाप से, शाप से, तीनों तापों से सदा तुलसी के रक्षक।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २० ॥
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये।
सेवा-जोग तुलसी कबहुं कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति,
मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के,
बांह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये॥२०॥
जग जानता है — हनुमान अपने भक्त को निवाजते हैं। अपराधी जानकर सैकड़ों सजा दो — लेकिन जो लड्डू से मरे उसे जहर मत दो। हे महाबीर! बाहु की पीड़ा जल्दी हरो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २१ ॥
बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो,
दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल,
आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये॥
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो,
माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर,
बांहुपीर राहुमातु ज्यौ पारि मारिये॥२१॥
बचपन से ही देखकर अपना बना लिया — दीनबंधु ने बिना कारण दया की। तुलसी का भरोसा तुम हो, बल तुम हो। कलि बड़ा विकराल है। हे केसरीकिशोर! बाहु की पीड़ा को राहु की माँ जैसे पार कर मारो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २२ ॥
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार,
केसरी कुमार बल आपनो संभारिये।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत,
मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये॥
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर,
सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिये।
पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर,
मकरी ज्यौ पकरि कै बदन बिदारिये॥२२॥
उखड़े को स्थापित करने वाले, स्थापित को अटल रखने वाले — हे केसरीकुमार! राम के गुलामों के लिए कल्पतरु — मुझ दीन-दुर्बल का सहारा तुम्हीं हो। बड़ी तालाब जैसी भुजा की पीड़ा को मगरमच्छ जैसे पकड़कर विदीर्ण करो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २३ ॥
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय,
राम की भगति, सोच संकट निवारिये।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे,
जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पव्बयते,
सुथल सुबेल भालू बैठि कैः बिचारिये।
महाबीर बांकुरे बराक बांह-पीर क्यों न,
लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये॥२३॥
राम का स्नेह, साहस, लक्ष्मण-सीता और राम की भक्ति — सोच-संकट निवारो। रोग-सागर देखकर जीव हार गया — जामवंत की तरह तुम्हारे भरोसे। हे महाबीर! बाहु की पीड़ा को लंकिनी की तरह लात-घात से मरोड़ कर मारो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २४ ॥
लोक-परलोकटूं तिलोक न बिलोकियत,
तोसे समरथ चष चारिहूं निहारिये।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,
नाथ हाथ सब निज महिमा विचारिये॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये।
बात तरुमूल बंहुसूल कपिकच्छरु-बेलि,
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये॥२४॥
तीनों लोकों में तुम जैसा समर्थ नहीं। कर्म, काल, लोकपाल — सब तुम्हारे हाथ में। तुम्हारा खास दास, तुम्हारा निवास उसके उर में — तुलसी को दुखी देखना भारी है। वात रोग की जड़ से बाहु की पीड़ा — कपि-खेल में ही उखाड़ो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २५ ॥
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे,
बकी बकभगिनी काहू ते कहा डरैगी।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कदि,
बहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी॥
आई है बनाइ बेष आप ही विचारि देख,
पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी।
पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसी की,
बोंहपीर महाबीर तेरे मारे मरगी॥२५॥
जैसे कपि-कान्ह ने पूतना पिशाचिनी को मारा — वैसे हे महाबीर! तुम्हारे मारे बाहु-पीड़ा भी मर जाए।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २६ ॥
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है,
बेदन विषम पाप ताप छल छांह की।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की,
पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांह की॥
पैटहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि,
बाबरी न होहि बानि जानि कपि नह की।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की,
सपथ महाबीर की जो रहै पीर बांह की॥२६॥
चाहे भाल की हो, काल की हो, त्रिदोष की हो — पाप-ताप-छल की पीड़ा हो। कर्म की कूट हो, जंत्र-मंत्र-बूटी की हो — हे पापिनी! दूर हो जा। हनुमान की दुहाई है, महाबीर की सौगंध है — जो बाहु में पीड़ा रहे।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २७ ॥
सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल,
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी,
रावन की रानी मेघनाद महतारी है।
भीर बांह पीर की निपट राखी महाबीर,
कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है॥२७॥
सिंहिका को बल से संहारा, सुरसा का छल सुधारा, लंकिनी को पछाड़ा, बाटिका उजाड़ी। लंका जलाई, राक्षसों को धूल किया। बाहु की पीड़ा निपट राखी है — किसका संकोच? तुलसी को बड़ी चिंता है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २८ ॥
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर,
भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की।
तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब,
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहू की॥
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,
हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है,
एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की॥२८॥
तुम्हारी बालक-क्रीड़ा सुनकर धैर्यवान भी सहम जाते हैं — इंद्र, सूर्य, राहु भी। तुम्हारे नाम से किसी को कोई आर्ति नहीं। क्या आलस, क्रोध या परिहास में सिखाना है? इतने दिन तुलसी की बाहु में पीड़ा रही।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — २९ ॥
टूकनि को घर-घर डोलत केगाल बोलि,
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है।
कीन्ही है संभार सार अंजनी कुमार बीर,
आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है॥
इतनो परेखो सब भोति समरथ आजु,
कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,
चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है॥२९॥
टुकड़ों के लिए घर-घर घूमते हुए बालक की तरह पाल-पोस लिया। हे अंजनी के कुमार! अपना नहीं भूलोगे — मुझे भी भरोसा है। तीनों लोकों में तुम जैसा कौन है? दास सजा सहता है — देखकर हँसो मत — चिड़ी का मरना बच्चों का खेल नहीं।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३० ॥
आपने ही पाप तें त्रिपात ते कि साप तें,
बढ़ी है बाह बेदन कही न सहि जाति है।
ओषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,
को है जगजाल जो न मानत इताति है।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कल्यो राम दूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है॥३०॥
अपने पाप से, त्रिताप से या शाप से — बाहु की पीड़ा बढ़ गई, सही नहीं जाती। अनेक औषध, जंत्र-मंत्र-टोटके किए — सब बेकार। तुलसी तेरे दास हैं, तू मेरा कहाया राम दूत — तेरी ढील से पीड़ा पीड़ित करती है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३१ ॥
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को,
समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को।
बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,
रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को॥
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज,
सीदत सुसेवक बचन मन काय को।
थोरी बांह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को,
कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को॥३१॥
राम के दूत, पवन के सुपुत्र — असहाय के सहाय। बाँकी विरदावली वेद गाते हैं — रावण जैसा भट मुट्ठी की मार से धराशायी हुआ। इतने बड़े समर्थ साहेब — आज निवाजो। थोड़ी बाहु-पीड़ा की बड़ी ग्लानि।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३२ ॥
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,
छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,
राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं॥
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग,
हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैं।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को,
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं॥३२॥
देवी, देव, दानव, मनुज, मुनि, सिद्ध — छोटे-बड़े सब राम दूत की आज्ञा मानते हैं। घोर जंत्र-मंत्र, कपट, कुरोग — हनुमान की आन सुनकर घर छोड़ते हैं। जो दोष-दुख दे रहे हैं उन्हें शुद्ध करो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३३ ॥
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों,
तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,
सकल समाज साज साजे रघुबर के॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ,
देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के॥३३॥
तुम्हारे बल से वानरों ने रावण से युद्ध जीता। तुम्हारा गुणगान सुनकर ब्रह्मा, हरि, हर के नेत्र सजल हो जाते हैं। हे कपिनाथ! तुलसी के माथे पर हाथ फेरो — अपने जैसे कारीगर का दास दुखी न दिखे।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३४ ॥
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न,
कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हरिये।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष,
पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये॥
अबु तू हौ अंबुचर, अबु तू हों डिंभ सो न,
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,
तुलसी की बांह पर लामी लूम फेरिये॥३४॥
अपने टुकड़े पर पले को — चूक होने पर भी मत छोड़ो। पोषो, तोषो, स्थापित करो। बालक को व्याकुल जानकर प्रेम पहचानकर — तुलसी की बाहु पर अपनी लंबी पूंछ फेरो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३५ ॥
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान,
हेरि हंसि होकि फूंकि फौजैं ते उड़ाई है।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है॥३५॥
रोग, कुयोग, कुलोगों ने ऐसे घेर लिया जैसे बादल-घटा उमड़ आई। करुणानिधान महाबलवान हनुमान — देखकर, मुस्कुराकर, हुँकार भरकर फूँककर फौजें उड़ा देते हैं। कुरोग रूपी राक्षसी तुलसी को खा रही थी — केसरीकिशोर ने बल से बचाया।हनुमान बाहुक
॥ सवैया — ३६ ॥
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसांई सुसांई सदा अनुकूलो।
पाल्यो हौ बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो॥
बांह की बेदन बांह पगार पुकारत आरत आनंद भूलो।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौ दरबार परो लटि लूलो॥३६॥
हे हनुमान गोसाईं! तुम राम के गुलाम हो — सदा अनुकूल। बालक की तरह दो अक्षर राम-नाम से पाला। बाहु की पीड़ा बाहु पर हाथ रखकर पुकारता हूँ — आर्त हूँ, आनंद भूल गया। हे रघुबीर के कृपापात्र! पीड़ा निवारो।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३७ ॥
काल की करालता करम कठिनाई कर्थ,
पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे।
बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन,
सोई बांह गही जो गही समीर डाबरे॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,
सींचिये मलीन भो तयो है तिहूं तावरे।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान,
जानियत सबही की रीति राम रावरे॥३७॥
काल की करालता, कर्म की कठिनाई, पाप का प्रभाव — स्वभाव से वात बावरा हो गया। दिन-रात पीड़ा सही नहीं जाती। तुलसी का पेड़ लाया — निहारकर सींचो — तीनों तापों से मलिन हो गया। हे करुणानिधान! सब जानते हो राम के रावरे।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३८ ॥
पंय पीर पेट पीर बह पीर मुंह पीर,
जरजर सकल पीर मई है।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है॥
हौ तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है।
कुंभज के कंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,
हाय राम राय ऐसी हाल कहूं भई है॥३८॥
पैरों में पीड़ा, पेट में पीड़ा, बाहु में पीड़ा, मुँह में पीड़ा — सारा शरीर जर्जर पीड़ामय है। देव, भूत, पितर, कर्म, दुष्ट, काल, ग्रह — मुझ पर दामन की तरह पड़े हैं। बचपन से ही बिना मोल बिका हूँ — राम नाम की ओट ललाट पर लिखी है। हाय राम! ऐसी हाल कहाँ भई।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ३९ ॥
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,
मुंहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग,
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ,
जिनके समूह साके जागत जहान हैं।
तुलसी संभारि ताडका संहारि भारि भट,
बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं॥३९॥
बाहुक-सुबाहु जैसे नीच, मारीच मिलकर — मुँह की पीड़ा, केतु से जन्मे कुरोग — ये सब राक्षस हैं। राम-लक्ष्मण दोनों अक्षरों को सुमिरो। तुलसी को संभालो — ताड़का संहार करके बड़े-बड़े भटों को बाण से भेदा है।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ४० ॥
बालपने सूथे मन राम सनमुख भयो,
राम नाम लेत मांगि खात टूकटाक हां।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय,
मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौ॥
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,
अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ।
तुलसी गुसांई भयो भोंडे दिन भूल गयो,
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं॥४०॥
बाल्यकाल में सीधे मन से राम के सामने हुआ — राम नाम लेते माँग-माँगकर खाया। लोक-रीति में पड़ा, मोह में बैठ गया। खोटे आचरण अपनाए — अंजनी के कुमार ने शुद्ध किया। तुलसी गोसाईं हो गए — बुरे दिनों में भूल गए — उसी का फल अंत में पक कर पा रहे हैं।हनुमान बाहुक
॥ घनाक्षरी — ४१ ॥
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो,
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो,
बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को॥४१॥
अन्न-वस्त्र से हीन, विषाद में लीन दीन-दुर्बल को देखकर हाय-हाय मत करो। तुलसी अनाथ को रघुनाथ ने सनाथ किया। नीच इसी बीच पति पाकर प्रभु-भजन छोड़ दिया — इसीलिए शरीर पिसता है — राम राय का नमक फूट-फूटकर निकलता है।
॥ घनाक्षरी — ४२ ॥
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन,
मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को।
तुलसी के दुहूं हाथ मोदक हैं ऐसे ठांउ,
जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को॥
मोको झूटो सांचो लोग राम को कहत सब,
मेरे मन मान है न हर को न हरि को।
भारी पीर दुसह सरीर ते बिहाल होत,
सोऊ रघुबीर बिनु सके दूर करि को॥४२॥
जीने को जानकीजीवन का जन कहलाता हूँ — मरने को काशी का गंगाजल। तुलसी के दोनों हाथों में लड्डू जैसी स्थिति। भारी पीड़ा से बिहाल होता हूँ — सो भी रघुबीर के बिना कौन दूर कर सके।
॥ घनाक्षरी — ४३ ॥
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,
हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै॥
व्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की,
समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,
रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कैः॥४३॥
सीतापति साहेब के सहायक हनुमान नित्य हैं। मन-वचन-काय से तुम्हारे चरणों की शरण। व्याधि, भूत, किसी दुष्ट की उपाधि — समाधि करो। हे कपिनाथ, रघुनाथ, भोलानाथ, भूतनाथ! रोग-सागर को गाय के खुर में क्यों न डालो?
॥ घनाक्षरी — ४४ ॥
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों,
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई,
बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के,
करैया राम बेद कहैं सांची मन गुनिये।
तुम्ह तं कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि,
हौ हूं रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये॥४४॥
हनुमान से, सुजान राम से, कृपानिधान शंकर से — सावधान होकर सुनिए। हर्ष-विषाद, राग-रोष, गुण-दोष — ब्रह्मा ने सब जगत में भरा। माया, जीव, काल, कर्म — सब करने वाले राम हैं — वेद सच कहते हैं। तुमसे क्या नहीं होता — मुझे बताओ। मैं भी मौन रहूँगा — जो हुआ उसे जानकर काट लो।
॥ फलश्रुति ॥
जो हनुमान बाहुक पढ़ैं भक्तिभाव नर।
बाहु-बेदन तासु मिटै सब संताप हर॥
तुलसीदास को कृपा भई हनुमान की।
राम-भक्ति मन में थई यही पहचान की॥
जो नर पढ़ैं अष्ट प्रहर श्रद्धा उर धरि।
तासु रोग मिटैं सब हनुमत कृपा करि॥
ॐ श्री हनुमते नमः।
जय श्रीराम।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हनुमान बाहुक का सबसे गहरा संदेश
तुलसीदास जी ने तीन काम किए जो हम सबको सीखना चाहिए।
पहला — दर्द में टूटे नहीं, गाया। पीड़ा को भक्ति में बदल दिया। यही सबसे बड़ी शक्ति है।
दूसरा — अपनी गलतियाँ खुलकर स्वीकार कीं। कहा — “चेरो तेरो तुलसी” — मैं तेरा दास हूँ। यही सच्ची भक्ति है।
तीसरा — हनुमानजी से बच्चे की तरह बात की। कभी रोए, कभी शिकायत की, कभी लाड़ लगाया। कोई ढकोसला नहीं। और हनुमानजी ने सुना।
कब और कैसे पढ़ें
मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से पढ़ो। किसी भी शारीरिक पीड़ा में — विशेषकर बाहु, कंधे, जोड़ों के दर्द में — 11 या 21 दिन नित्य पाठ करो। सुबह स्नान के बाद हनुमानजी के सामने घी का दीपक जलाकर पढ़ो। सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करो।
अंत में
तुलसीदास जी ने एक ही बात कही — बारम्बार, अलग-अलग तरीकों से —
“चेरो तेरो तुलसी — तू मेरो कल्यो राम दूत।”
मैं तेरा दास हूँ। तू मेरा राम दूत।
बस इतना कहो। बाकी सब हनुमानजी करते हैं।
जय हनुमान। जय श्रीराम।
ॐ श्री हनुमते नमः।।
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