दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

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दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य की वो स्तुति जो मौन में ज्ञान देती है

जिंदगी में एक ऐसा वक्त आता है —

जब सब पढ़ लिया। सब सुन लिया। सब सोच लिया। फिर भी कुछ समझ नहीं आता।

उस वक्त क्या करें?

हमारे शास्त्रों में एक ऐसे गुरु हैं जो मौन में उपदेश देते हैं।

दक्षिणामूर्ति।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

भगवान शिव का वो रूप जो वट वृक्ष के नीचे दक्षिण की तरफ मुँह करके बैठे हैं। उनके सामने बैठे हैं सनकादि ऋषि — ब्रह्मांड के सबसे पुराने और ज्ञानी मुनि। और गुरु दक्षिणामूर्ति मौन हैं।

कोई शब्द नहीं। कोई व्याख्यान नहीं।

और उसी मौन में — शिष्यों के सब संदेह दूर हो गए। पूर्ण ज्ञान मिल गया।

यही है दक्षिणामूर्ति का चमत्कार — मौन की भाषा।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् — आदि शंकराचार्य की सबसे गहरी रचना। यह केवल स्तोत्र नहीं — यह एक पूरा वेदांत दर्शन है। हर श्लोक में एक गहरा सत्य।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् क्या है — जानो इसकी गहराई

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। इसमें दस श्लोक और एक फलश्रुति है।

इस स्तोत्र में अद्वैत वेदांत का पूरा सार है। आत्मा और ब्रह्म की एकता। माया का स्वरूप। जगत् की मिथ्यता। और परम सत्य का ज्ञान।

शंकराचार्य ने कहा — दक्षिणामूर्ति स्वयं शिव हैं। और शिव ही गुरु हैं। और गुरु ही ब्रह्म हैं।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

॥ दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् ॥

॥ आदि शंकराचार्य विरचितम् ॥

॥ पूर्वभाग — ध्यानम् ॥

ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये।
निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः।।

प्रणव (ॐ) के अर्थ स्वरूप, शुद्ध ज्ञान की एकमात्र मूर्ति को। निर्मल, प्रशांत दक्षिणामूर्ति को नमस्कार।

॥ मुख्य स्तोत्र ॥

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं।
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।१।।

यह विश्व दर्पण में दिखते नगर जैसा है — अपने भीतर स्थित। जो माया से बाहर जैसा प्रतीत होता है — जैसे नींद में सपना। जो प्रबोध के समय अपने आत्मा को ही अद्वय (एकमात्र) साक्षात् करते हैं — उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

यह पहला श्लोक — अद्वैत वेदांत का सबसे सुंदर वर्णन। विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरी — यह जगत् दर्पण में दिखने वाले नगर जैसा है। दर्पण में नगर दिखता है — लेकिन वो नगर दर्पण के बाहर नहीं, दर्पण में ही है। वैसे ही यह जगत् आत्मा के बाहर नहीं — आत्मा में ही है। निद्रया — जैसे सपने में सब कुछ सच लगता है — जागने पर पता चलता है सब माया था। वैसे ही ज्ञान होने पर यह जगत् माया समझ आती है।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः।
मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम्।।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।२।।

जैसे बीज के भीतर अंकुर होता है — यह जगत् पहले निर्विकल्प था, फिर माया से कल्पित देश-काल की विचित्रता में चित्रित हुआ। जो इंद्रजालिक की तरह और महायोगी की तरह स्वेच्छा से इसे प्रकट करते हैं — उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

बीजस्यान्तरिवांकुरो — बीज के भीतर पेड़ छुपा है। ऐसे ही इस सारी सृष्टि का बीज — परमात्मा में था। माया ने उसे प्रकट किया। मायावीव — जैसे जादूगर कुछ नहीं से सब कुछ दिखा देता है — वैसे ही माया ने शून्य से जगत् रचा।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते।
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान्।।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।३।।

*जिनका सदात्मक स्फुरण असत् (मिथ्या) को सत् जैसा भासित करता है। जो आश्रितों को वेद वचन *”तत्त्वमसि”* से बोध देते हैं। जिनके साक्षात्कार से संसार-सागर में पुनः आगमन नहीं होता। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।*

तत्त्वमसि — वो तुम ही हो। छांदोग्य उपनिषद का महावाक्य। यही अद्वैत वेदांत का सर्वोच्च सत्य है। दक्षिणामूर्ति यही बोध देते हैं — हे शिष्य! जिसे तुम बाहर खोज रहे हो — वो तुम्हारे भीतर है। भवाम्भोनिधौ — संसार के सागर में — जिसे ज्ञान हो गया — वो फिर इस सागर में नहीं लौटता।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं।
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते।।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत् समस्तं जगत्।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।४।।

*जैसे अनेक छिद्रों वाले घड़े के भीतर रखे महादीप की प्रभा बाहर चमकती है — वैसे ही जिनका ज्ञान आँख आदि इंद्रियों के द्वारा बाहर स्पंदित होता है। *”मैं जानता हूँ”* — यह वो ही प्रकाशित होते हैं जिनसे यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।*दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

यह श्लोक अद्भुत दार्शनिक है। नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरम् — घड़े में छेद हैं — उन छेदों से दीपक की रोशनी बाहर आती है। वैसे ही हमारी आँखें, कान, नाक — ये शरीर के छेद हैं। इनसे बाहर जो प्रकाश आता है — वो भीतर की आत्मा का प्रकाश है। जब कहते हो “मैं जानता हूँ” — वो मैं आत्मा है — जो सब कुछ जानती है।

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः।
स्त्री बालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः।।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।५।।

*जो देह, प्राण, इंद्रियाँ, चंचल बुद्धि और शून्य को *”मैं”* समझते हैं — वो स्त्री, बालक, अंधे और जड़ के समान भ्रमित होकर बोलते हैं। माया-शक्ति के विलास से कल्पित महामोह का संहार करने वाले। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।*दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि — जो समझते हैं कि शरीर ही मैं हूँ, प्राण ही मैं हूँ, इंद्रियाँ ही मैं हूँ — वो भ्रम में हैं। यही सबसे बड़ा अज्ञान है। दक्षिणामूर्ति इस महामोह को नष्ट करते हैं।

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्।
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान्।।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।६।।

*राहु से ग्रस्त सूर्य और चंद्र की तरह — माया से आच्छादित होकर। इंद्रियों के उपसंहार से सुषुप्त (गहरी नींद) में केवल सत्-मात्र रह जाता है। जागने पर *”मैं सोया था”* — ऐसी पहचान होती है — वो जो प्रत्यभिज्ञान है। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।*

यह श्लोक सुषुप्ति — गहरी नींद — का विश्लेषण करता है। राहु सूर्य को ग्रहण लगाता है — सूर्य अदृश्य हो जाता है। वैसे ही माया आत्मा को ढक देती है। गहरी नींद में सब इंद्रियाँ बंद हो जाती हैं — लेकिन “मैं” रहता है। जागने पर पता चलता है — “मैं सोया था” — यानी सोते समय भी “मैं” था।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि।
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।।
आत्मानं परिपूर्णचिन्मयघनं स्वात्मस्थमात्रं विदन्।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।७।।

*बाल्यकाल से लेकर जागृत आदि सभी अवस्थाओं में। जो अवस्थाएं बदलती रहती हैं — उनमें अनुवर्तमान *”मैं”* सदा भीतर स्फुरित होता है। आत्मा को परिपूर्ण चिन्मय घन और स्वात्मस्थ जानकर। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।*

यह श्लोक अत्यंत गहरा है। बचपन में अलग, जवानी में अलग, बुढ़ापे में अलग — शरीर बदलता है। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति — अवस्थाएं बदलती हैं। लेकिन एक “मैं” है जो नहीं बदलता। वो “मैं” ही आत्मा है — परिपूर्ण, चिन्मय, सत्।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः।
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः।।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।८।।

यह विश्व कार्य-कारण से, स्वामी-सेवक से, शिष्य-आचार्य से, पिता-पुत्र आदि भेद से देखा जाता है। स्वप्न में या जागृत में — जो यह पुरुष माया से भ्रमित होता है। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।

यह जगत् में सभी संबंध — गुरु-शिष्य, माता-पिता, स्वामी-सेवक — यह माया के कारण हैं। जब ज्ञान होता है — सब एक ही आत्मा के अंश दिखते हैं। जो जागृत में सच लगता है — स्वप्न में झूठ। जो स्वप्न में सच लगता है — जागने पर झूठ। तो फिर क्या सच है? आत्मा।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान्।
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्।।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात् परस्माद्विभोः।
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।।९।।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र और पुरुष (जीव) — यह अष्टमूर्ति चराचर रूप से जिनसे प्रकाशित है। उनसे परे विभु से कुछ भी अलग नहीं — ऐसा विमर्श करने पर समझ आता है। उन श्री गुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

शिव की अष्टमूर्ति — पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), सूर्य, चंद्र और जीव — यही आठ मूर्तियाँ हैं। यानी यह सारी सृष्टि ही शिव का शरीर है। और उनसे परे कुछ नहीं। नान्यत्किंचन विद्यते — कुछ भी दूसरा नहीं है।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे।
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात्।।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः।
सिद्ध्येत्तत् पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम्।।१०।।

*इस स्तव में जिस *”सर्वात्मत्व”* को स्पष्ट किया गया है। इसके श्रवण से, उसके अर्थ मनन से, ध्यान से और संकीर्तन से। सर्वात्मत्व की महाविभूति सहित ईश्वरत्व स्वतः सिद्ध होता है। और आठ प्रकार के ऐश्वर्य अव्याहत (निर्बाध) रूप से प्राप्त होते हैं।*

यह अंतिम श्लोक — इस स्तोत्र का उद्देश्य बताता है।

सर्वात्मत्व — सबमें आत्मा देखना। यही परम ज्ञान है। इसे पाने के चार उपाय — श्रवण (सुनना), मनन (सोचना), ध्यान (ध्यान करना), संकीर्तन (गाना-बोलना)।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

जो यह करता है — उसे ईश्वरत्व मिलता है। और आठों ऐश्वर्य — अणिमा से लेकर सभी सिद्धियाँ — स्वतः प्राप्त होती हैं।

॥ फलश्रुति ॥

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं।
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात्।।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं।
जनन मरण दुःखच्छेददक्षं नमामि।।

वट वृक्ष के समीप भूमि पर बैठे, समस्त मुनियों को ज्ञान देने वाले। तीनों भुवनों के गुरु, ईश दक्षिणामूर्ति देव को। जन्म-मृत्यु के दुःख काटने में दक्ष उन्हें मैं नमन करता हूँ।दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः।।

विचित्र है — वट वृक्ष की जड़ में वृद्ध शिष्य, गुरु युवा। गुरु का मौन ही व्याख्यान है — और शिष्यों के सब संशय छिन्न हो गए।

यह श्लोक दक्षिणामूर्ति का सबसे सुंदर वर्णन है। युवा गुरु — वृद्ध शिष्य। मौन उपदेश — और सब संदेह दूर।

ॐ नमः प्रणवार्थाय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

दक्षिणामूर्ति का रहस्य — मौन की भाषा

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का सबसे बड़ा संदेश यह है —

ज्ञान शब्दों में नहीं — मौन में है।

जब शंकराचार्य इस स्तोत्र में दार्शनिक सत्य बताते हैं — तो वो दक्षिणामूर्ति की उस मौन परंपरा को शब्दों में उतार रहे हैं।

पहला सत्य — यह जगत् दर्पण में दिखने वाले नगर जैसा है — सत्य नहीं।

दूसरा सत्य“मैं” — वो आत्मा जो सब अवस्थाओं में एक ही रहती है — वही परमात्मा है।

तीसरा सत्य“तत्त्वमसि” — वो तुम ही हो। जिसे बाहर खोजते हो — वो भीतर है।

चौथा सत्य — सर्वात्मत्व — सबमें आत्मा देखना — यही मोक्ष है।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र कब और कैसे पढ़ें

गुरुवार को विशेष रूप से पढ़ो — गुरु का दिन। गुरु पूर्णिमा पर विशेष पाठ। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में पढ़ो — जब मन शांत हो।

किसी वट वृक्ष के नीचे बैठकर पढ़ने का विशेष महत्व है। ध्यान लगाकर पढ़ो — हर श्लोक का अर्थ समझने की कोशिश करो।

पाठ के बाद ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये महामहेश्वराय ब्रह्मण्याय ब्रह्मविद्याप्रदाय नमः का जप करो।

अंत में

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् का सबसे बड़ा सत्य —

“चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः।।”

गुरु मौन हैं — और शिष्यों के सब संशय दूर हो गए।

यही सबसे बड़ा सत्य है। जब मन शांत होता है, जब शब्द रुकते हैं, जब विचार थमते हैं — उस मौन में सत्य प्रकट होता है।

दक्षिणामूर्ति उसी मौन का नाम है।

ॐ नमः दक्षिणामूर्तये।।


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