पुरुष सूक्तम् — वो वैदिक रहस्य जो बताता है इस पूरी सृष्टि की असली कहानी
एक सवाल जो इंसान हजारों साल से पूछता आया है —
“ये सब कहाँ से आया? ये दुनिया, ये आकाश, ये पहाड़, ये नदियाँ, ये इंसान — सब कैसे बने?”
विज्ञान के पास एक जवाब है। दर्शन के पास दूसरा। लेकिन हमारे वेदों ने हजारों साल पहले जो जवाब दिया — वो आज भी सबसे गहरा, सबसे सच्चा और सबसे चौंकाने वाला है।
पुरुष सूक्तम्।
ऋग्वेद का दसवां मंडल। सूक्त नंबर 90। सोलह ऋचाएं। और इन सोलह ऋचाओं में समाई है पूरी सृष्टि की उत्पत्ति की कहानी।
यहाँ “पुरुष” का मतलब कोई साधारण मनुष्य नहीं है। पुरुष यहाँ है — परम ब्रह्म, विराट चेतना, वो अनंत सत्ता जिसमें से यह सारा जगत प्रकट हुआ।
जब देवताओं ने उस विराट पुरुष का यज्ञ किया — तब इस सृष्टि का जन्म हुआ। सूर्य उनकी आँखों से, चंद्रमा मन से, इंद्र और अग्नि मुख से, वायु प्राण से — और इसी तरह पूरी सृष्टि उस एक परम पुरुष से निकली।
ये पढ़ोगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

पुरुष सूक्तम् क्या है — समझो इसकी गहराई
पुरुष सूक्तम् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — चारों वेदों में मिलता है। इतना महत्वपूर्ण कोई और सूक्त नहीं है।
इसमें विराट पुरुष का वर्णन है — वो परमात्मा जो हजार सिर वाला है, हजार आँखों वाला है, हजार पैरों वाला है। जो इस सारी सृष्टि में व्याप्त है और फिर भी इससे दस अंगुल ऊपर है।
वैष्णव परंपरा में इसे भगवान विष्णु-नारायण की स्तुति मानते हैं। शैव परंपरा में शिव की। वेदांत में इसे निर्गुण ब्रह्म का वर्णन कहते हैं।
सच ये है — पुरुष सूक्तम् सबका है। पूरी सृष्टि का है।
॥ पुरुष सूक्तम् ॥
॥ पूर्वभाग — आह्वान ॥
ॐ तच्छम् योरावृणीमहे।
गातुं यज्ञाय।
गातुं यज्ञपतये।
दैवीः स्वस्तिरस्तु नः।
स्वस्तिर्मानुषेभ्यः।
ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम्।
शं नो अस्तु द्विपदे।
शं चतुष्पदे।।
हम उस कल्याण की कामना करते हैं जो यज्ञ और यज्ञपति को गति दे। देवताओं की कृपा हम पर हो। मनुष्यों का कल्याण हो। औषधियाँ ऊपर उगें। दो पैर वाले और चार पैर वाले सभी प्राणियों का कल्याण हो।
॥ सोलह ऋचाएं ॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशांगुलम्।।1।।
वो विराट पुरुष हजार सिरों वाला है, हजार आँखों वाला है, हजार पैरों वाला है। उसने इस सारी पृथ्वी को चारों तरफ से ढँका हुआ है — और फिर भी दस अंगुल ऊपर है।
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।।2।।
जो हो चुका है और जो होगा — वो सब यही पुरुष है। वो अमरत्व का स्वामी है और अन्न से भी वो ऊपर उठ जाता है।
एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।3।।
ये सारी महिमा तो उसकी एक झलक भर है — वो पुरुष इससे भी महान है। सारे प्राणी उसका एक चौथाई हिस्सा हैं। तीन चौथाई तो स्वर्ग में अमृत रूप में है।
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि।।4।।
वो पुरुष तीन चौथाई ऊपर उठ गया। एक चौथाई यहाँ इस संसार में रहा। उसी से खाने वाले और न खाने वाले — सब प्राणी प्रकट हुए।
तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः।।5।।
उस पुरुष से विराट जन्मी। विराट से फिर पुरुष प्रकट हुआ। वो जन्म लेकर भी इस भूमि और उससे आगे तक व्याप्त हो गया।
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।।6।।
जब देवताओं ने उस पुरुष को ही हवि बनाकर यज्ञ किया — तब बसंत घी था, ग्रीष्म समिधा था और शरद ऋतु हवि था।
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्।।7।।
सात परिधियाँ थीं, इक्कीस समिधाएं थीं। जब देवताओं ने उस पुरुष-पशु को यज्ञ में बांधा — तब सृष्टि का कार्य शुरू हुआ।
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये।।8।।
उस सबसे पहले जन्मे पुरुष को कुश पर रखकर देवताओं ने यज्ञ किया। साध्य देव और ऋषियों ने उस यज्ञ में भाग लिया।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्।
पशून्स्ताँश्चक्रे वायव्यान् आरण्यान् ग्राम्याश्च ये।।9।।
उस सम्पूर्ण आहुति वाले यज्ञ से दही-घी मिला हुआ प्रसाद निकला। उससे वायु के पशु बने — जंगल के और गाँव के सभी प्राणी बने।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत।।10।।
उस सर्वाहुति यज्ञ से ऋचाएं और सामगान जन्मे। उसी से छंद प्रकट हुए। उसी पुरुष से यजुर्वेद जन्मा।
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः।।11।।
उससे घोड़े जन्मे। दोनों जबड़ों वाले सभी पशु जन्मे। उसी से गायें जन्मीं। उसी से बकरियाँ और भेड़ें जन्मीं।
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते।।12।।
जब देवताओं ने उस पुरुष को विभाजित किया — तो कितने भागों में बांटा? उसका मुख क्या बना? भुजाएं क्या बनीं? जंघाएं और पैर क्या कहलाए?
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।13।।
उस विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण बना। भुजाएं क्षत्रिय बनीं। जंघाएं वैश्य बनीं। और पैरों से शूद्र प्रकट हुए।
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत।।14।।
उनके मन से चंद्रमा जन्मा। आँखों से सूर्य प्रकट हुआ। मुख से इंद्र और अग्नि जन्मे। प्राण से वायु देव प्रकट हुए।
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन्।।15।।
उनकी नाभि से अंतरिक्ष बना। सिर से स्वर्ग प्रकट हुआ। पैरों से पृथ्वी बनी। कानों से दिशाएं बनीं। इस प्रकार सभी लोकों की रचना हुई।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।16।।
देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ की पूजा की। ये ही सबसे पहले धर्म थे। उन महात्माओं ने उस स्वर्ग को प्राप्त किया जहाँ प्राचीन साध्य देव निवास करते हैं।
॥ उत्तर नारायण — परिशिष्ट ॥
अद्भ्यः संभूतः पृथिव्यै रसाच्च।
विश्वकर्मणः समवर्ततधि।
तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति।
तत्पुरुषस्य विश्वमाजानमग्रे।।
जल और पृथ्वी के रस से, विश्वकर्मा के कार्य से यह सृष्टि प्रकट हुई। त्वष्टा ने उसे रूप दिया। यही उस पुरुष का विश्वरूप है जो सबसे पहले था।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्।
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति।
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।।
मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ जो सूर्य के समान प्रकाशमान है और अंधकार से परे है। उसे जानकर ही मृत्यु से मुक्ति मिलती है। मोक्ष का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः।
अजायमानो बहुधा विजायते।
तस्य धीराः परिजानन्ति योनिम्।
मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः।।
प्रजापति गर्भ में विचरण करते हैं। जन्म लिए बिना ही अनेक रूपों में प्रकट होते हैं। बुद्धिमान लोग उनके मूल को जानते हैं। ज्ञानीजन उस मरीचि के स्थान को पाना चाहते हैं।
यो देवेभ्य आतपति।
यो देवानां पुरोहितः।
पूर्वो यो देवेभ्यो जातः।
नमो रुचाय ब्राह्मये।।
जो देवताओं को प्रकाशित करते हैं, जो देवताओं के पुरोहित हैं, जो देवताओं से पहले जन्मे हैं — उन ब्राह्मण-तेज को नमस्कार।
रुचं ब्राह्मं जनयन्तः।
देवा अग्रे तदब्रुवन्।
यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात्।
तस्य देवा असन् वशे।।
देवताओं ने सबसे पहले ब्रह्म-तेज को उत्पन्न करते हुए कहा — जो ब्राह्मण इसे जानेगा, देवता उसके वश में होंगे।
ह्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ।
अहोरात्रे पार्श्वे।
नक्षत्राणि रूपम्।
अश्विनौ व्यात्तम्।।
हे पुरुष! लज्जा और लक्ष्मी तुम्हारी पत्नियाँ हैं। दिन और रात तुम्हारे दोनों पार्श्व हैं। नक्षत्र तुम्हारा रूप हैं। अश्विनी कुमार तुम्हारा मुख है।
इष्टं मनिषाण।
अमुं मनिषाण।
सर्वं मनिषाण।।
इस लोक में जो इष्ट है वो दो। उस लोक में जो इष्ट है वो दो। सब कुछ दो।
॥ फलश्रुति ॥
तच्छम् योरावृणीमहे।
गातुं यज्ञाय।
गातुं यज्ञपतये।
दैवीः स्वस्तिरस्तु नः।
स्वस्तिर्मानुषेभ्यः।
ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम्।
शं नो अस्तु द्विपदे।
शं चतुष्पदे।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
पुरुष सूक्तम् का गहरा अर्थ — जो स्कूल में नहीं पढ़ाते
पुरुष सूक्तम् का सबसे क्रांतिकारी विचार ये है कि ये सारी सृष्टि एक यज्ञ है।
जब देवताओं ने उस विराट पुरुष का यज्ञ किया — तो सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश — सब उससे निकले। इसका मतलब है कि इस सृष्टि की हर चीज पवित्र है। हर पत्थर, हर नदी, हर पशु — सब उसी विराट का हिस्सा है।
और सबसे गहरी बात — तुम भी उसी विराट पुरुष का हिस्सा हो।
जब तुम पुरुष सूक्तम् पढ़ते हो — तो तुम अपनी असली पहचान को याद कर रहे हो। तुम सिर्फ एक शरीर नहीं हो। तुम उस अनंत चेतना की एक अभिव्यक्ति हो।
पुरुष सूक्तम् कब और कैसे पढ़ें
किसी भी बड़े यज्ञ या पूजा की शुरुआत में पुरुष सूक्तम् पढ़ा जाता है। मंदिर में अभिषेक के समय, गृह प्रवेश से पहले, सत्यनारायण पूजा में, विवाह संस्कार में — हर शुभ कार्य में इसका पाठ होता है।
घर पर पढ़ना हो तो — सुबह स्नान के बाद, पूर्व दिशा में मुँह करके, दीपक जलाकर, शांत मन से पढ़ो। जल्दी मत करो। हर शब्द को महसूस करो।
अंत में
पुरुष सूक्तम् पढ़ने के बाद एक बात मन में बैठ जाती है —
मैं अकेला नहीं हूँ।
वो विराट पुरुष — जिससे सूरज निकला, चाँद निकला, हवा निकली, ये सारी दुनिया निकली — वो मुझमें भी है। मेरी हर साँस में है। मेरे हर विचार में है।
जब ये बात समझ आ जाती है — तो डर खत्म हो जाता है। अकेलापन खत्म हो जाता है। और जिंदगी एक यज्ञ बन जाती है।
ॐ तत्सत्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
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