रुद्राष्टकम्

रुद्राष्टकम् — तुलसीदास रचित वो आठ श्लोक जो भगवान शिव को तुरंत प्रसन्न करते हैं

जिंदगी में कभी ऐसा वक्त आता है —

मन में इतनी उथल-पुथल होती है कि समझ नहीं आता क्या करें। संकट इतने गहरे होते हैं कि रास्ता नहीं सूझता। और उस वक्त मन पुकारता है —

भोलेनाथ।

शिव — जो सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं। जो दुखियों के देव हैं। जो शमशान में भी बैठते हैं और महल में भी। जो भूत-पिशाच के नाथ हैं और देवताओं के भी।रुद्राष्टकम्

रुद्राष्टकम् — गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में स्थित। आठ श्लोक। हर श्लोक में भगवान शिव का एक अद्भुत रूप।

यही वो स्तोत्र है जिसे काशी के घाटों पर, शिव मंदिरों में, महाशिवरात्रि की रात — हर जगह गाया जाता है।रुद्राष्टकम्

रुद्राष्टकम् क्या है — जानो इसकी पृष्ठभूमि

रुद्राष्टकम् गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित है। यह रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में है।

इसमें आठ श्लोक हैं — सभी शिव की महिमा में। हर श्लोक में शिव के एक अलग रूप का वर्णन है — नीलकंठ, त्रिनेत्र, डमरूधर, गंगाधर, पिनाकपाणि।

तुलसीदास जी ने रामभक्त होते हुए भी शिव की इतनी सुंदर स्तुति लिखी — क्योंकि शिव और राम अभिन्न हैं। राम ने भी रामेश्वरम् में शिव की पूजा की थी।रुद्राष्टकम्

॥ रुद्राष्टकम् ॥

॥ श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत ॥

॥ पूर्वभाग ॥

ॐ नमः शिवाय।

॥ आठ श्लोक ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्।।१।।

मैं ईशान — ईश्वरों के ईश्वर — को नमन करता हूँ जो निर्वाण रूप हैं, विभु, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप हैं। जो निज, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह हैं। जो चिदाकाश हैं और आकाश में वास करते हैं — उन्हें मैं भजता हूँ।

पहले ही श्लोक में शिव का परब्रह्म स्वरूप स्थापित हो जाता है। निर्वाणरूपम् — मोक्ष का स्वरूप। ब्रह्मवेदस्वरूपम् — ब्रह्म और वेद का स्वरूप। निर्गुणं निर्विकल्पम् — गुणों से परे, विकल्पों से परे। चिदाकाश — चेतना का आकाश। शिव सर्वत्र हैं — आकाश की तरह।

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं।
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।।
करालं महाकालकालं कृपालं।
गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्।।२।।

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (चौथी अवस्था) वाले। वाणी, ज्ञान और इंद्रियों से परे, ईशान, गिरीश (पर्वतों के स्वामी)। महाकाल के भी काल, कराल, कृपालु। गुणों के आगार और संसार के परे — मैं नमन करता हूँ।

करालं महाकालकालं कृपालम् — यह पंक्ति अद्भुत है। कराल — भयंकर। महाकालकाल — महाकाल के भी काल। लेकिन साथ ही कृपाल — कृपालु। शिव का यही विरोधाभास उन्हें अनोखा बनाता है — जो सबसे भयंकर है वही सबसे कृपालु भी है।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं।
मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम्।।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा।
लसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजङ्गा।।३।।

हिम पर्वत जैसे गौर, गहरे। करोड़ों कामदेवों की प्रभा और श्री के शरीर वाले। जिनके मस्तक पर लहराती सुंदर गंगा है। जिनके सुंदर माथे पर बाल-चंद्रमा और कंठ पर सर्प है।

तुषाराद्रिसंकाश गौरम् — हिमालय जैसे श्वेत-गौर। मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् — करोड़ों कामदेवों से भी सुंदर शरीर। जो शरीर काम को जला दे — वो शरीर स्वयं काम से भी सुंदर है। स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा — जटाओं में लहराती गंगा की सुंदर लहरें।

चलत्कुण्डलं शुभ्रनेत्रं विशालं।
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं।
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।४।।

हिलते कुंडल, शुभ्र और विशाल नेत्र। प्रसन्न मुख, नीलकंठ, दयालु। शेर की खाल पहने, मुंडमाल धारण किए। प्रिय शंकर — सभी के नाथ — को मैं भजता हूँ।

नीलकण्ठं दयालम् — यह पंक्ति सब कुछ कह देती है। विष पीकर कंठ नीला हुआ — यह परोपकार है। संसार को बचाने के लिए स्वयं पीड़ा सही। और वो दयालु भी हैं — दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं।

मृगाधीशचर्माम्बरम् — शेर की खाल वस्त्र — इच्छाओं पर विजय का प्रतीक। मुंडमालम् — मुंडमाल — यह वैराग्य का प्रतीक है।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।।
त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं।
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्।।५।।

प्रचंड, प्रकृष्ट, प्रगल्भ, परेश। अखंड, अज, करोड़ सूर्यों जैसे प्रकाशमान। त्रिशूल से तीनों दुःखों को नष्ट करने वाले, शूलपाणि। भावगम्य भवानीपति को मैं भजता हूँ।

त्रयःशूलनिर्मूलनम् — त्रिशूल से तीनों दुःखों — आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक — का नाश। शिव का त्रिशूल केवल शस्त्र नहीं — यह तीनों तापों का नाशक है।

भावगम्यम् — भाव से प्राप्त होने वाले। शिव को पाने के लिए कोई कठिन साधना नहीं — बस सच्चा भाव चाहिए।

कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी।
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।।
चिदानन्दसंदोहमोहापहारी।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।६।।

कला से परे, कल्याण स्वरूप, कल्पांत करने वाले। सदा सज्जनों को आनंद देने वाले, पुरों के शत्रु (त्रिपुरारि)। चिदानंद के समूह से मोह को हरने वाले। हे प्रभु मन्मथारि! प्रसन्न हो, प्रसन्न हो।

प्रसीद प्रसीद — दो बार। जब भक्त का दिल टूट जाता है — तो वो बस यही कहता है। प्रसन्न हो। प्रसन्न हो। और शिव — जो भोलेनाथ हैं — दो बार पुकार सुनते ही प्रसन्न हो जाते हैं।

पुरारी — त्रिपुर का नाश करने वाले। मन्मथारी — कामदेव के शत्रु — यानी काम को जीतने वाले।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं।
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।।
न तावत् सुखं शान्तिसंपद्विलासं।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्।।७।।

जब तक मनुष्य इस लोक या परलोक में उमानाथ के चरण-कमल नहीं भजते। तब तक उन्हें सुख, शांति, संपद और विलास नहीं मिलता। हे प्रभु! सभी प्राणियों में वास करने वाले! प्रसन्न हो।

यह सातवाँ श्लोक — जीवन का सबसे बड़ा सत्य कह देता है।

जब तक शिव नहीं — तब तक सुख नहीं।

धन हो, यश हो, परिवार हो — लेकिन शिव की भक्ति न हो — तो सब अधूरा है। असली सुख, असली शांति, असली संपद — शिव के चरणों से आती है।

सर्वभूताधिवासम् — सभी प्राणियों में वास करने वाले। यानी जब शिव को भजते हो — तो हर जीव में शिव देखते हो।

महात्मा महाज्ञान महाभागवत।
वसन्ते त्वदीये मनोराजहंसाः।।
अयोध्यानरेशस्य राघोः प्रियस्य।
प्रसीद प्रभो राघवस्यात्मबन्धो।।८।।

महात्मा, महाज्ञान, महाभागवत लोगों के मन रूपी राजहंस तुम्हारे चरण-कमल में निवास करते हैं। अयोध्या के राजा, राघव के प्रिय — हे प्रभु! राघव के आत्मबंधु! प्रसन्न हो।

यह आठवाँ और अंतिम श्लोक तुलसीदास जी की भक्ति का परम शिखर है।

यहाँ तुलसीदास जी ने शिव को राघवस्यात्मबंधो कहा — राम के आत्म-बंधु। यानी राम और शिव अभिन्न हैं।

अयोध्यानरेशस्य राघोः प्रियस्य — अयोध्या के राजा राम के प्रिय शिव। जो राम का प्रिय है — वो हमारा भी प्रिय।

यही तुलसीदास की भक्ति है — राम से शिव तक, शिव से राम तक।

॥ फलश्रुति ॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।

यह रुद्राष्टकम् शिव को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण ने कहा। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे पढ़ते हैं — उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।

ॐ नमः शिवाय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

रुद्राष्टकम् की सबसे बड़ी विशेषता

तुलसीदास जी ने इस स्तोत्र में शिव के दो रूपों का अद्भुत संगम किया है।

एक तरफ शिव का निर्गुण, निराकार, परब्रह्म रूप — जो दार्शनिकों का शिव है। दूसरी तरफ शिव का सगुण, साकार, भोलेनाथ रूप — जो भक्तों का शिव है।

नीलकंठ, गंगाधर, डमरूधर, मुंडमाली — यह सगुण शिव।
निर्गुण, निर्विकल्प, चिदाकाश — यह निर्गुण ब्रह्म।

और दोनों एक ही हैं।

यही रुद्राष्टकम् का सार है।

रुद्राष्टकम् से सबसे बड़ा सबक

सातवाँ श्लोक —

“न यावद् उमानाथपादारविन्दं।
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत् सुखं शान्तिसंपद्विलासं।”

जब तक शिव के चरण नहीं भजते — तब तक सुख नहीं।

यह कोई डर नहीं है। यह सत्य है।

शिव सुख के स्रोत हैं। शांति के स्रोत हैं। जब उनसे जुड़ते हो — तो सुख मिलता है। जब उनसे दूर होते हो — तो सुख भी दूर हो जाता है।

रुद्राष्टकम् कब और कैसे पढ़ें

Bhagavata Puranaसोमवार और प्रदोष को विशेष रूप से पढ़ो। महाशिवरात्रि की रात पूरी रात पढ़ो। सुबह स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, भस्म अर्पण करके पढ़ो। घी का दीपक जलाओ।

पाठ के बाद ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करो।

अंत में

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में शिव की स्तुति की — यह बताता है कि शिव और राम अलग नहीं।

रुद्राष्टकम् के अंतिम श्लोक में तुलसीदास जी ने शिव को राघवस्यात्मबंधो कहा — राम के आत्म-बंधु।

जो राम का प्रिय है, जो राम का बंधु है — उसे हम कैसे न भजें?

शिव भजो। राम भजो। दोनों एक हैं।

ॐ नमः शिवाय।
जय श्री राम।।


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